जय माँ शारदे
# कलमरथ परिवार दैनिक आयोजन
दिन शुक्रवार
दिनांक 18/02/2022
विषय अपनों का साथ जरूरी है।
विधा गद्य और पद्य
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शीर्षक महकते रिश्ते
विधा गद्य
.................मानवीय संवेदना ,भावना, करुणा व्यथा का रिश्तों अभिन्न संबंध रहा है।एकाकीपन मानव जीवन को ऐसे बंजर जमीन पर ला पटक देता है कि जहाँ अपना कहने के लिए कोई नहीं होता है।अकेलेपन मानव मन को अनेकों सवालों से घेरे रहता है।कल क्या होगा, क्या आने वाले कल में उनको कोई साथ देगा,क्या कल कोई अपना कहने वाला भी मिलेगा।बिना रिश्तों की जिन्दगी इतनी बोझिल हो जाती है कि उन को खींचने के लिए शरीर का सारा दम कम पड़ जाता है।अकेले रहते रहते मन तंग हो जाता है।अनेकों दुःचिन्ताएं मन को मथती रहती है।चिंता तो चिता से भी भयावह होतीं है।सुबह वक्त पर आँखें खुल जाय और रात में वक्त पर आँखें लग जाय, यह भी जीने के लिए कम नहीं है, पर एकाकी जीवन में रात रातभर चिंता से नींद नहीं आती है।अतः जिन्दगी की खुशियों के लिए रिश्तों के फूलों की सुगंध चाहिए।रिश्ते सुखद एहसास है, हृदय स्पर्शी कोमल भाव है, अविरल माधुर्य रस भीनी भीनी खुशबू का प्रवाह है, जो तन मन में तरोताजा सुखद उन्माद से तरंग, उमंग ,उत्साह से प्लावित कर देता है।अहले सुबह की पहली किरण जैसे मन को गुदगुदा देती है,।हृदय गगन को झिलमिल सितारे जैसे भाव विभाव,अनुभाव से आलोकित कर देता है।प्रेम प्यार, ममता, स्नेह, वात्सल्य भाव ,अनुराग, से जीवन को मधुरतम रसों से सराबोर कर देता है।अपनों का एहसास सुरभित कुसमित पुष्पों रसों लावण्य माधुर्य की भीनी भीनी सुगंध, धरा के कण कण सेआती सौंधी गंध, जीवन के महकते उपवन की खुशियों भरे फूलों की मुस्कान है।निर्झर के झर झर रव,तितलियों का मनोरम नृत्य, भँवरों मधुर गुंजन, मलयानिल की सुरभित पवन, पराग कणों से महकती बासंती पवन, कोयल की कुहू कुहू तानतन मन में स्पन्दन, मधुर मधु सिहरन प्रणय प्यार भरे मधुर जीवन के लिए अपनों का साथ जरूरी है।अपनों का साथ एक सुखद कल्पना जैसी, अधरों पर स्मित मुस्कान, कपोलों पर मृदुल चुम्बन है।
बड़े ही मनमोहक, मनभावन रसीले छंदों जैसे रस भरे होठों के मनोरम गीत जैसे, प्रिय के बाँहों का स्पर्श, आलिंगन का एहसास के लिए अपनों का साथ जरुरी है।इसीलिए हम अपने अपनों को, रिश्तों के मधुरतम बंधनों को निखारें।अपनों का साथ इस जहाँ की जन्नत को खुशनुमा खुशबू से महकाते रहता है।वह खुशनसीब इंसान है, जिन्हें अपनों का साथ मिला है।
....।..................................................मैं, मोहन प्र.यादव, यह मेरी स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित रचना है।ब्लॉग पर अपलोड किया जा सकता है।
मोहन प्र.यादव,
जरदाहा, दुमका, झारखण्ड
पिन 814120
