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Sunday, October 23, 2022

October 23, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
कलमरथ दैनिक आयोजन 2022
दिनांक 23/10/2022
दिन रविवार 
विषय रूप 
विधा कविता 
आयोजक कलमरथ परिवार भारत 

देख कर दर्पण में रूप सलोना ,
मत इतराना अय खिलती कली। 
तेरे इस रूप के दीवाने हैँ बहुत। 
करते हैँ तेरे सुन्दर रूप से प्यार।
वक्त के साथ रूप बदल जाता है़। 
पड़ जाती हैँ गालों में झुर्रियां ,
हो जाते श्वेत केश सिर के। 
कहेगा  देख कर यही दर्पण ,
सुन्दरी आया गया है़ बुढ़ापा। 
देख कर रूप ,अपना दर्पण में। 
हो जाओगी  तुम खफा दर्पण पर। 
मन का रूप होता मधुर 
जो अंत तक रहता सुन्दर। 
रूप पर न कभी इतराना। 

स्वरचित मौलिक अप्रकाशित 
नरेन्द्र श्रीवात्री स्नेह 
बालाघाट म प्र

Friday, February 18, 2022

February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in ,
नमन मंच
कलमरथ परिवार
कलमरथ दैनिक आयोजन 2022
दिनाँक 18/2/2022
दिन शुक्रवार
विषय अपनों का साथ जरूरी है़
विधा कविता
शीर्षक अपनों का साथ जरूरी है़
क्रमांक76

वक़्त आ गया है़ अब ऐसा ,
अपनों से दूर रहा नहीं जाता।
अकेले अब जिया नहीं जाता, 
आती हैं विपदाऐं अनेक।
उस वक़्त याद आते हैं अपने 
लगता तब मन में ,
जो साथ होते अपने।
गले से लिपट कर रो लेते हम।
दो शब्द सांत्वना के कोई कह देता।
गम अपना हो जाता कम।
मुसीबत में अपने ही आते हैं काम।
करते अपने एक दूजे की मदद।
हो जाते हैं पूरे सारे काम।
वक़्त बुरा हो या अच्छा।
अपनों का साथ जरूरी है़।

स्वरचित मौलिक अप्रकाशित रचना। ब्लाग में अपलोड करने की अनुमति है़।
नरेन्द्र श्रीवात्री स्नेह
बालाघाट म. प्र.

Monday, May 24, 2021

May 24, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन मंच
#कलमरथ परिवार दैनिक आयोजन 2021
#विषय कसम
#विधा कहानी
#शीर्षक कसम
#दिनांक 24/5/2021
#दिन सोमवार
क्रमांक 76

कसम लेना आसान होता है़ पर उसे निभाना कठिन होता है़। ये कहानी है़ मेरी स्वयं की जो मैंने और मेरी पत्नी ने आज से ठीक पचास वर्ष 25मई सन 1972को खाई थी। मैंने अपनी पत्नी श्रीमती कामिनी श्रीवात्री के साथ ली थी।
मैंने अपनी पत्नी से प्यार किया था और हमने कसमें ली थी की हम एक दूसरे का साथ दुख और सुख में साथ निभाएंगे। हमने प्रेम विवाह किया था।
मेरी और कामिनी की जाति अलग अलग थी। समाज उस समय इन बंधनों को कहाँ मानता है़।
हमने अपने गृह नगर जबलपुर से भाग कर अपने परिचित जो कलकत्ता में रहते थे उनके पास गए। वहाँ उनने हमारी शादी अदालत में एक माह बाद करवा दी।
वहाँ के एक जूट मिल के निजी पाठशाला में मुझे शिक्षक की नौकरी मिल गई पर कुछ महीने बाद बिहारी और बंगालियों में विवाद हो गया। वहाँ पर हड़ताल हो गई मिल और पाठशाला भी बन्द हो गई हमारे ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट गया ।हमने हिम्मत नहीं हारी एक दूजे का साथ निभाने की कसम जो खाई थी।
मैंने अपनी बड़ी बहिन और अपने जीजा जी को पत्र लिखा और अपनी पूरी कहानी बताई। जीजा जी का पत्र आया उनने मुझे क्षमा कर अपने पास बुला लिया जहाँ मैंनेपाँच रुपए दिन पर दैनिक मजदूरी में काम मिला। हमने कुछ माह तक काम किया।
रोजगार दप्तर के एक बाबू को जब हमारी कहानी पता चली तो उनने ड्रेसर के प्रशिक्षण का कार्ड निकलवा दिया।तीन माह का प्रशिक्षण मैंने विक्टोरिया अस्पताल जबलपुर से प्राप्त किया। एक सौ दस रुपया मिलता था। बड़ी मुश्किल से गुजारा होता था। कई बार तो भूखे रहने की भी नौबत आईं पर मेरी पत्नी ने अपनी कसम निभाई। पाँच साल बाद मुझे विभागीय फार्मासिस्ट का प्रशिक्षण भोपाल से लिया। और मैं गाँव में नियुक्त हुआ। हमने साथ रहने की कसम खाई थी जो निभा रहे हैं।
आज मेरे परिवार में तीन बहू तीन पुत्र पाँच नाती और एक नातिन है़।
हम अपनी कसम आज भी निभा रहे हैं। कल 25मई को हमारी शादी की पचासवीं साल गिरह है़।
स्वलिखित अप्रकाशित मौलिक सत्य कहानी।
नरेन्द्र श्रीवात्री स्नेह
बालाघाट म. प्र.

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