Friday, June 23, 2023

June 23, 2023 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
#मंच को नमन 🙏
#कलम रथ परिवार 

#विषय : योग 
#विधा : कविता 
#दिनांक: 22/6/2023 

          " योग  "
        *********

तन मन सुख दुःख ,
         काया का झगड़ा ।
योग निदान ,
      सुख जीवन का सगड़ा ।
नित्य सवेरा लेकर ,
                   तुम जागो  ।
नियमित योग साधना,
                    तप को नापो ।  

स्वस्थ शरीर का यही ,
                  चलन उपाय ।
सच हैं दर्शन ,
           हर शास्त्र बताए ।
भोर का योग ,
           जीवन का अमृत  ।
जीना हैं तो ,
              बस पीते जाए ।

ना कोई नागा ,
              ना कोई देर ।
तुरन्त निभाओ हल यही,
                      जीवन का मेल ।
सच जीवन की दौलत , 
                      यही समझाती ।
             नहीं बड़ा कोई इससे खेल ।

             कलम ✍
        अरुण ठाकर , जिन्दगी 
        जयपुर , राजस्थान ।

स्वरचित : मौलिक 

मंच का आभार 🙏

Sunday, October 23, 2022

October 23, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
जय मां शारदे
मंच को नमन
#कलमरथ साहित्य परिवार
#दिनांक :- २३-१०-२०२२
#वार :- रविवार
#विषय :- रूप
#विधा :- कविता 

वह हमेशा ऐसे राहों पर चलती है,
अपने रूप से सारे जग को छलती है।
उसके रूप को देखकर मोहित हो जाते हैं सब,
जब वह जूड़े में गुलाब का फूल लगाकर निकलती है।।

वह अपने रूप से ही जग को मारती है,
वह अपनी निगाहों से कभी नहीं हारती है।
रूबी उसका सुंदर सलोना लगता है,
वह एक नहीं हजारों पर डोरे डालती है।।

उसे अपने रूप पर इतना गुमान क्यों है,
वह इतराकर क्यों चलती है,इतना अभिमान क्यों है।
रूप तो मात्र एक छलावा सा होता है जग में,
इस बात को समझता नहीं, इंसान क्यों है।।

प्रभात राजपूत ''राज''गोंण्डवी
गोंडा-उत्तर प्रदेश
October 23, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
कलमरथ दैनिक आयोजन 2022
दिनांक 23/10/2022
दिन रविवार 
विषय रूप 
विधा कविता 
आयोजक कलमरथ परिवार भारत 

देख कर दर्पण में रूप सलोना ,
मत इतराना अय खिलती कली। 
तेरे इस रूप के दीवाने हैँ बहुत। 
करते हैँ तेरे सुन्दर रूप से प्यार।
वक्त के साथ रूप बदल जाता है़। 
पड़ जाती हैँ गालों में झुर्रियां ,
हो जाते श्वेत केश सिर के। 
कहेगा  देख कर यही दर्पण ,
सुन्दरी आया गया है़ बुढ़ापा। 
देख कर रूप ,अपना दर्पण में। 
हो जाओगी  तुम खफा दर्पण पर। 
मन का रूप होता मधुर 
जो अंत तक रहता सुन्दर। 
रूप पर न कभी इतराना। 

स्वरचित मौलिक अप्रकाशित 
नरेन्द्र श्रीवात्री स्नेह 
बालाघाट म प्र

Tuesday, October 18, 2022

October 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन मंच कमलरथ परिवार
विषय गिरगिट
विधा कविता
दिनांक 18/10/2022

रंग बदलते लोग देखके
गिरगिट भी भौंचक्का है,
इतने रंग न देखे उसने
हर जन ज्यों उचक्का है|

अभिमान को जो पाल रहे
स्वाभिमान उनका छूटा है
शौक के लिए छ्ले लोग को
ईर्ष्या लोभ में जग डूबा है|

गिरगिट तो रंग बदलता
अपनी रक्षा वो करता है,
मैं मेरा केवल मैं के लिए
मनुज कितने रंग बदलता है| 

सरीसृप धूसर वो रंग लिए 
गर्दन उठाके इशारे किए,
सच कहता वो हमने माना है
नेता का रूप आज पहचाना है|

कितने रंग रूप नेता लिए हैं
गिरगिट सीमित ये जग में फैले हैं,
लोभ लालच सत्ता के लिए 
नित नए रंग में बदले हुये हैं|

अपनेपन की बात करते हैं
दिल में कड़वाहट रखते हैं,
मक्कारी के नए पैंतरे आजमाते
चेहरे पे मुस्कुराहट रखते हैं|

सोचा मैंने गिरगिट से सीख लूँ 
रंग बदलने की कला सीख लूँ,
किसी को घाव देने के लिए नहीं
अपने बचाव के लिए सीख लूँ|

रचनाकार का नाम- संजीव कुमार भटनागर
लखनऊ, उ. प्रदेश
मेरी यह रचना मौलिक व स्वरचित है। ब्लॉग में अपलोड की मेरी स्वीकृति है।

Friday, February 18, 2022

February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
#कलम रथ परिवार
#विषय अपनों का साथ जरूरी है
#शीर्षक अपनों से जंग 
#विधा कविता

भले बैर भाव पल रहे जंग नहीं लड़ सकते हैं 
चंद चांदी के सिक्कों पे हम नहीं अड़ सकते हैं

अपनापन अनमोल गायब सदाचार मिलता कहां 
रिश्तो में कड़वाहट घुली वह प्रेम प्यार रहा कहां

एक दूजे को नैन दिखाए भाई से भाई टकराए 
जर जमीन के चक्कर में शह मात सभी खाए

हक औरों का खाकर भी कोई आसमां नहीं चढ़ता 
अपनों से जंग जो पाले दुनिया में कब आगे बढ़ता

प्यार के मोती लुटाओ सद्भावों की गंगा बहा दो 
अपनों से जंग छोड़ो दुनिया में शोहरत पाओ

उच्च विचार रखकर सुधा रस बरस जाने दो 
खुशियों के सुहाने पल अब जिंदगी में आने दो

दुनिया में आनंद बरसे मत करना अपनों को तंग 
सुख दुख में काम आए अपनों से ना लड़ना जंग

अपने अपने ही होते हैं अनजान मत होने देना 
रिश्तों की मधुरता दिल से कभी ना खोने देना

रमाकांत सोनी नवलगढ़
जिला झुंझुनू राजस्थान
February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन कलम रथ परिवार
दिनांक - 18/2/22
विषय - अपनों का साथ जरूरी है।
विधा -लघुकथा

मानव की महत्वाकांक्षी अभिलाषा कभी कभी इतनी बलवती हो जाती है कि रिश्तों को काटते काटते खुद एक दिन परिवार रिश्तों और समाज से अलग हो जाता है और फिर एक दिन जिंदगी में ऐसा मुकाम भी आता है कि उसकी अंतरात्मा खुद बोल उठती है कि अपनों का साथ भी जरूरी है।
कबीर एक छोटे से परिवार मे जन्मा पला बढ़ा और ऊंची शिक्षा के साथ साथ बचपना से जवानी की डगर पर कदम रख चुका था माता पिता ने उससे बहुत ही आकांक्षाएं पाल रखी थी कि एक दिन वो बहुत बड़ा सरकारी अफ़सर बन अपने परिवार को मध्यम वर्गीय परिवार से उठा कर एक उच्चस्तरीय श्रेणी में ले जाए।
मगर उसके परिवार की आकांक्षाओं और उच्च श्रेणी में जाने की आशा को उसकी महत्वाकांक्षी अभिलाषा ने ग्रहण कर लिया क्योंकि उसे उससे भी ज्यादा महत्वाकांक्षी महिला का साथ मिल गया वो थी उसकी प्रेमिका कमली..
कबीर तुम मुझे कितना प्यार करते हो .. कमली ने उसके गले में बाहों का हार डालते हुए कहा।
हम एक दूसरे के बिना जीवित नहीं रह सकते .. तुम कहो तो आज ही शादी के रश्मों में बंध जाते हैं .. कबीर ने मुस्कुराते हुए जबाव दिया।
वो तो सत्य है हमारा भी वही हाल है परन्तु अब तुम भी एक अदद उच्च श्रेणी के आफिसर हो और तुम्हारा परिवार अभी भी पुराने ख्याल का ..अगर तुम मेरे साथ रहना चाहते हो तो ..हम शादी के बाद अलग दुनिया बसाएंगे हमारा परिवार से कोई लेना देना नहीं होगा .. कमली ने कहा ।
कोई बात नहीं ..अब आज हमारे पास सब कुछ है फिर परिवार जमाने के पचड़े में क्या पड़ना ..हम जहां होंगे वहीं अपना परिवार और समाज बन जाएगा .. कबीर ने कहा।
शर्तों का प्यार धीरे धीरे जीवन साथी के रूप में बदल चुका था  दुनिया का एशो आराम आज उसके कदमों में थी नौकर चाकर गाड़ी बंगला सभी उसके पास थे।
बचपन के मित्र मानव के समझाने पर कोई असर नहीं हो पा रहा था क्योंकि अब उसके पास दौलत शोहरत ऊंची सोसायटी में उठक बैठक उसके सामने रिश्ते नाते परिवार सब फीका पड़ रहा था 
एक दिन ऐसा भी आएगा कि तू सबकुछ होते हुए भी कुछ नहीं होगा अपने आप को बहुत ही अकेला महसूस करेगा तब कहेगा कि अपनों का साथ भी जरूरी है...मानव ने समझाते हुए कहा।
जबकि जब देखी जाएगी फिलहाल हमें तुम जैसे घटिया और छोटे लोगों की सलाह और उनका पास रहना भी नहीं अच्छा लगता .. कबीर ने मानव की बेइज्जती करते हुए कहा।
मानव समय के अनुकूल व्यवहार न पाकर कभी न पास आने और बात करने की कसम खाकर चला गया।
कबीर और कमली के दो बच्चे थे उनको अच्छी शिक्षा और अच्छी परवरिश के लिए पहले हास्टल और फिर विदेश भेज दिया पढ़ने के लिए..
समय के साथ दोनों बच्चे जवान हो गये और वहीं विदेश मे शादी करके सटल हो गये और कबीर कमली एक तरह से अकेले रह गये.
वक्त के साथ कमली भी उसका साथ छोड़ कर चली गई अब कबीर दुनिया में अकेला रह गया और उसको अब रिश्तों की अहमियत समाज की दूरी परेशान करने लगी।
एक दिन उसने अपने बचपन के मित्र मानव को याद किया मानव आया और एक बार फिर उसे समाज परिवार रिश्तों के अहमियत के बारे में फिर से जुड़ने में उसकी मदद की ।
अपनों का साथ जरूरी है .. आखिर एकबार फिर कबीर को यह बात माननी पड़ी ।

राजन मिश्र
अंकुर इंक्लेव करावलनगर दिल्ली 94

रचना स्वरचित मौलिक अप्रकाशित है ब्लॉग पल पोस्ट करने की अनुमति है
February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in ,
नमन मंच
कलमरथ परिवार
कलमरथ दैनिक आयोजन 2022
दिनाँक 18/2/2022
दिन शुक्रवार
विषय अपनों का साथ जरूरी है़
विधा कविता
शीर्षक अपनों का साथ जरूरी है़
क्रमांक76

वक़्त आ गया है़ अब ऐसा ,
अपनों से दूर रहा नहीं जाता।
अकेले अब जिया नहीं जाता, 
आती हैं विपदाऐं अनेक।
उस वक़्त याद आते हैं अपने 
लगता तब मन में ,
जो साथ होते अपने।
गले से लिपट कर रो लेते हम।
दो शब्द सांत्वना के कोई कह देता।
गम अपना हो जाता कम।
मुसीबत में अपने ही आते हैं काम।
करते अपने एक दूजे की मदद।
हो जाते हैं पूरे सारे काम।
वक़्त बुरा हो या अच्छा।
अपनों का साथ जरूरी है़।

स्वरचित मौलिक अप्रकाशित रचना। ब्लाग में अपलोड करने की अनुमति है़।
नरेन्द्र श्रीवात्री स्नेह
बालाघाट म. प्र.
February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
जीवन है इक सफर,
और हम सब इसके राही।
चलते जा रहे कर्म को करते,
तृष्णा मन में समाई।
यह भी पाना ,वह भी पाना,
यह सोच कर भागे जा रहे।
छूटते  जा रहे सारे रिश्ते नाते,
फिर भी न हम पछ्ता रहे।
माना व्यस्त हुई ज़िन्दगी ,
न अपनों से हम मिल पाते है।
दिन बीतते है महीनों  में और,
 माह वर्ष है बन जाते है।
करके  अथक परिश्रम गर,
पा भी लेंगे हम बहुत कुछ।
पर अपने ही संग न होंगे,
फिर क्या करेंगे हम सब कुछ।
सच्ची ख़ुशी तब ही मिलेगी,
जब कोई बाँटने वाला हो।
रिश्ते नाते संगी साथी ,
बस संबंधों में अपनापन हो।

नंदिनी लहेजा
रायपुर छतीसगढ़
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित
February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन मंच
कमल रथ परिवार
दिनांक-18-02-2022
विषय अपनों का साथ जरूरी है
विद्या कविता

अकेले जीना आसान नहीं है।
अपनों बिना रहना आसान नहीं है ।
अपनों के संगम करें प्रभु पूरी है।
अपनों का साथ जरूरी है।।

बड़ी परेशानियां अपने मिलें हैं।
पल अपनों की जरूरत होती है।
हमदर्दी से ताकत मिलती पूरी है।
अपनों का साथ जरूरी है।

हर्ष उल्लास सभी कार्य होते।
जब सब अपने साथ होते हैं।
अकेलापन होती मजबूरी है।
अपनों का साथ जरूरी है।

जीवन में अपनों से कैसी  दूरी है।
अपना ही अपने दुख में जरूरी है।
अपनों के सहारे होताअति जरूरी
अपनों   का साथ जरूरी है।।

आलिंगन का एहसास जरूरी है।
अपनी बाहों में यह सुख रसीला है।
 जख्मों को मरहम की मंजूरी है।
 अपनों का साथ जरूरी है।।।

बड़ा कठिन दुनिया में जीना है।
जीवन में परीक्षाये जरूरी है।
अपनों का सिर पर हाथ जरूरी है।
अपनों का साथ जरूरी है।

स्वरचित मौलिक तथा अप्रकाशित
संगीता चमोली देहरादून उत्तराखंड
ब्लॉग हेतु सहमति है
February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
#नमन कलमरथ परिवार
दिनांक-१८/२/२०२२
विषय-अपनों का साथ जरूरी है

अपनों का साथ जरूरी है,

अपनों का साथ जरूरी है
 जाहिर जज्बात जरूरी है।

अपनों का समझो महत्व
मिलना मिलाना जरूरी है।

संबल  देते लेते हैं अपने
मिलना  संबल जरूरी है।

सुख- दुख  में जीवन के
अपनों का,साथ जरूरी है।

भागम भाग की दुनियाँ में
किंतु ठहराव भी जरूरी है।

समझे रिश्तों की अहमियत
अपनों में सौहार्द्र जरूरी है।

अपनों को अपना बना रखिए
सोचें क्या बिखराव  जरूरी है।

रिश्तों में रहे स्नेह सद् भावना
नहीं लगता टकराव जरूरी है।

लता शर्मा
जांजगीर छ ग
स्व लिखित व मौलिक रचना
February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन मंच कमलरथ परिवार
विषय अपनों का साथ जरूरी है
दिनांक 18/2/2022
विधा कविता

अकेले कहा हम जी पायेंगे
अपनों का साथ जरूरी है।
संग होंगे जब अपने फिर तो
हर तकलीफ भी मंजूर है।

दुनिया में जीना नहीं आसान
देने पड़ते हैं हमें तो इम्तिहान
मगर हो जाता है सबकुछ ही
आसान जब सर पर हाथ हो।

बड़ी बड़ी परेशानियां भी हम
कर लेते हैं पार दिल के पास
हो हमारे सभी साथ सभी का
भाये दूर हो जाये हर दर्द ही।

नीरू बंसल हनुमान गढ राजस्थान स्वरचित।ये रचना मौलिक एवं अप्रकाशित है
February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
जय माँ शारदे
# कलमरथ परिवार दैनिक आयोजन
दिन शुक्रवार
दिनांक 18/02/2022
विषय अपनों का साथ जरूरी है।
विधा गद्य और पद्य
............................. ..
शीर्षक महकते रिश्ते 
विधा गद्य
.................मानवीय संवेदना ,भावना, करुणा व्यथा का रिश्तों अभिन्न संबंध रहा है।एकाकीपन मानव जीवन को ऐसे बंजर जमीन पर ला पटक देता है कि जहाँ अपना कहने के लिए कोई नहीं होता है।अकेलेपन मानव मन को अनेकों सवालों से घेरे रहता है।कल क्या होगा, क्या आने वाले कल में उनको कोई साथ देगा,क्या कल कोई अपना कहने वाला भी मिलेगा।बिना रिश्तों की जिन्दगी इतनी बोझिल हो जाती है कि उन को खींचने के लिए शरीर का सारा दम कम पड़ जाता है।अकेले रहते रहते मन तंग हो जाता है।अनेकों दुःचिन्ताएं मन को मथती रहती है।चिंता तो चिता से भी भयावह होतीं है।सुबह वक्त पर आँखें खुल जाय और रात में वक्त पर आँखें लग जाय, यह भी जीने के लिए कम नहीं है, पर एकाकी जीवन में रात रातभर चिंता से नींद नहीं आती है।अतः जिन्दगी की खुशियों के लिए रिश्तों के फूलों की सुगंध चाहिए।रिश्ते सुखद एहसास है, हृदय स्पर्शी कोमल भाव है, अविरल माधुर्य रस भीनी भीनी खुशबू का प्रवाह है, जो तन मन में तरोताजा सुखद उन्माद से तरंग, उमंग ,उत्साह से प्लावित कर देता है।अहले सुबह की पहली किरण जैसे मन को गुदगुदा देती है,।हृदय गगन को झिलमिल सितारे जैसे भाव विभाव,अनुभाव से आलोकित कर देता है।प्रेम प्यार, ममता, स्नेह, वात्सल्य भाव ,अनुराग, से जीवन को मधुरतम रसों से सराबोर कर देता है।अपनों का एहसास सुरभित कुसमित पुष्पों रसों लावण्य माधुर्य की भीनी भीनी सुगंध, धरा के कण कण सेआती सौंधी गंध, जीवन के महकते उपवन की खुशियों भरे फूलों की मुस्कान है।निर्झर के झर झर रव,तितलियों का मनोरम नृत्य, भँवरों मधुर गुंजन, मलयानिल की सुरभित पवन, पराग कणों से महकती बासंती पवन, कोयल की कुहू कुहू तानतन मन में स्पन्दन, मधुर मधु सिहरन  प्रणय प्यार भरे मधुर जीवन के लिए अपनों का साथ जरूरी है।अपनों का साथ एक सुखद कल्पना जैसी, अधरों पर स्मित मुस्कान, कपोलों पर मृदुल चुम्बन है।
बड़े ही मनमोहक, मनभावन रसीले छंदों जैसे रस भरे होठों के मनोरम गीत जैसे, प्रिय के बाँहों का स्पर्श, आलिंगन का एहसास के लिए अपनों का साथ  जरुरी है।इसीलिए हम अपने अपनों को, रिश्तों के मधुरतम बंधनों को निखारें।अपनों का साथ इस जहाँ की जन्नत को खुशनुमा खुशबू से महकाते रहता है।वह खुशनसीब इंसान है, जिन्हें अपनों का साथ मिला है।
....।..................................................मैं, मोहन प्र.यादव, यह मेरी स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित रचना है।ब्लॉग पर अपलोड किया जा सकता है।
मोहन प्र.यादव,
जरदाहा, दुमका, झारखण्ड
पिन 814120
February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमनमंच
#कलमरथ_परिवार 
दिनांक-१८.०२.२०२२
विषय-अपनों का साथ जरूरी है
विधा-कविता(व्यंग्य)
*********************
मजाक अच्छा है
कि अपनों का साथ जरूरी है,
मगर आधुनिकता के इस युग में
सिर्फ मजबूरी है,
सिर्फ अपने स्वार्थ या मजबूरी में
तो ठीक है और जरुरी भी
वरना सिर्फ सीनाजोरी है।
ये मजाक नहीं तो और क्या है
माँ बाप का साथ भी 
आज जरुरी कहाँ है,
साथ है भी तो बड़ी मजबूरी है,
वरना माँ बाप और संतानों के बीच
न मिटने वाली दूरी है।
चलिए मान लिया कि अपनों का साथ जरूरी है
पर अपना कहने और साथ की 
जरूरत से भी अधिक जरूरी है 
अपनों की औकात क्या है?
हमारा अपना स्वार्थ, हमारी अपनी जरुरतें
जो आप से पूरी हो सकती हैं,
आपकी और आपके साथ की
इससे बड़ी जरूरत और क्या हो सकती है?
अपने और अपनों का साथ
सिर्फ छलावा है,
बिना स्वार्थ के अपने और अपनों का साथ
महज दिखावा है।
अब न अपनों की जरूरत है
न अपनेपन का और अपनों के साथ का,
जो स्वार्थ सिद्ध करता रहे हमारा
हमें तो ऐसे ही अपनों के साथ की जरूरत है
बाकी सब अपने और अपनों का साथ
सब गैर जरुरी भी तो है। 

सुधीर श्रीवास्तव
गोण्डा, उत्तर प्रदेश
८११५२८५९२१
© मौलिक, स्वरचित, अप्रकाशित
कलमरथ ब्लॉग में प्रकाशन की स्वीकृति देता हूं।
February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
कलम रथ परिवार
दिनांक-०९-०१-२०२२
नयी कविता
......…..…....
कुछ तो हुआ
यूं ही नहीं टूटने लगे हम
अपनी शाखाओं से।
जरा सोचो तो
विषम परिस्थितियों में
जिन्होंने हमें
सहारा दिया,
तनकर खड़ा होने से लेकर
सफलता के सोपान तक
पहुंचाने में
हमारा मूलाधार रहा,
आखिर क्यों
भुला दिया आज
उन्हीं संबंधों को।
स्वच्छंद जीवन की
हमारी सोच ने,
खत्म कर दी
रिश्तों की सारी गर्माहट।
जिधर देखो सिर्फ
कड़वाहट ही कड़वाहट।
जूझना होगा हमें,
विषम परिस्थितियों से
देना होगा
अपने खोखले जीवन को
एक नया मोड़।
तभी मिलेगी
बदलते रिश्ते को
 एक अलग पहचान।
सुनील प्रहरी.जमालपुर.मुंगेर.( बिहार)

Friday, June 11, 2021

June 11, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह 1 comment
नमन मंच
#कलमरथ परिवार
कलमरथ महा-प्रतियोगता
दिनांक-0106.2021
दिन-मंगलवार
विषय-भारतीय संस्कृति
विधा-आलेख
✍️🌱🙏🌺✍️🌴🕉🥦🌲✍️⛳🌷🚩🌹🥦🥗☘️
धन्यम ही वर्षम,
धन्या:भारत संस्कृति।
भारतीय जना:धन्य:,
धन्या:स्माकं परंपरा।
जिस धरा का कण कण जीवंत सहस्रों सभ्यताओं का जनक हो,उस भारतीय संस्कृति के बारे में लिखना और व्याख्यान करना बहुत बड़े ज्ञान को संजोए रखनें से कम नहीं है।भारतीय संस्कृति का मूलाधार सदा सैद्धान्तिक और व्यावहारिक दृष्टि से बसुधैव कुटुम्बकम् रहा है।अहिंसा परमो धर्म के सिद्धान्त पर चलकर विश्व की सबसे बड़ी और संघर्षशील लड़ाई जीत कर अपनें लोकतंत्रात्मक शासन की पुनर्स्थापना करने वाला यही भारत है।राम राज्य की परिकल्पना और उसे यथार्थ में परिपालन करना बहुत बड़ी उपलब्धि है।
भारती संस्कृति का मूलाधार वेद और पुराण माने जाते हैं।वहीं से हर प्रकार की साहित्य,संगीत, कला का प्रादुर्भाव होकर विश्व सभ्यताओं को संजोने संवारने का काम किया है।
भारतीय संस्कृति की चार विशेषतायें रही हैं जो प्राचीन काल से मनुष्य के चार पुरूषार्थ बतलाती हैं-
धर्म
अर्थ
काम
मोक्ष
इन चार पुरूषार्थों के बल पर हम अपनें जीवन में कैसे भी कठिन से कठिन कार्यों को सरलता पूर्वक हल कर सकते हैं।
इसी प्रकार इस नाशवान देह के पालन पोषण के लिए भी चार आश्रमों को बतलाया गया है ताकि अवस्था के अनुसार हम अधिक अशक्तता के चक्कर में ना पड़ें।यह इस प्रकार से है-
ब्रह्मचर्य
गृहस्थ
वानप्रस्थ
सन्यास
संयुक्त परिवार प्रथा हमारी संस्कृति की देन है, विश्वभर में हमारी उतम जीवन शैली- "सादा जीवन उच्च विचार" के मंत्र को विश्व के अनेक देशों ने अपना लिया है।इस देश ने पूर्व पाषाण काल से और आज तक क ई सभ्यताओं को जन्म दिया है।त्रेता से कलयुग की लंबी यात्रा करते कभी थके हारे नहीं।राम और कृष्ण,राम और रहीम,अल्लाह और यीशु,गौतम और महात्मा बुद्ध का यह देश विविधता में एकता का प्रतीक होनें के साथ बाघ और बकरी एक ही तालाब में एक साथ पानी पीने वालों का यतार्थ उदाहरण मौजूद हैं।
अंत में मैं यही कहूंगा कि यह विविधताओं में एकता का प्रतीक है जिसनें सारे विश्व का समय-समय पर नेतृत्व कर नयी राह एवं नये आयाम दिये हैं।साहित्य, संगी,कला,गायक,वादक,नारी पराक्रम, नारी सम्मान, विज्ञान,नवीन अन्वेषक आदि महत्वपूर्ण कार्यों में भारतीय संस्कृति एक जीवंत रूप है और रहेगा।

                 सर्वथा मौलिक अप्रकाशित 
                  मगनेश्वर नौटियाल"बट्वै" 
                            श्यामांगन 
        भेटियारा/कालेश्वर,उतरकाशी,उतराखण्ड

मैं मगनेश्वरनौटियाल"बट्वै"घोषणा करता हूँ कि यह आलेख मेरी स्वरचित ए्वं अप्रकाशित है

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