Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on February 18, 2022 with No comments | Categories: आ0 'नंदिनी लहेजा' जी, कविता, सहारा
जीवन है इक सफर,
और हम सब इसके राही।
चलते जा रहे कर्म को करते,
तृष्णा मन में समाई।
यह भी पाना ,वह भी पाना,
यह सोच कर भागे जा रहे।
छूटते जा रहे सारे रिश्ते नाते,
फिर भी न हम पछ्ता रहे।
माना व्यस्त हुई ज़िन्दगी ,
न अपनों से हम मिल पाते है।
दिन बीतते है महीनों में और,
माह वर्ष है बन जाते है।
करके अथक परिश्रम गर,
पा भी लेंगे हम बहुत कुछ।
पर अपने ही संग न होंगे,
फिर क्या करेंगे हम सब कुछ।
सच्ची ख़ुशी तब ही मिलेगी,
जब कोई बाँटने वाला हो।
रिश्ते नाते संगी साथी ,
बस संबंधों में अपनापन हो।
नंदिनी लहेजा
रायपुर छतीसगढ़
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित

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