Showing posts with label आ0 'राजन मिश्र' जी. Show all posts
Showing posts with label आ0 'राजन मिश्र' जी. Show all posts

Friday, February 18, 2022

February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन कलम रथ परिवार
दिनांक - 18/2/22
विषय - अपनों का साथ जरूरी है।
विधा -लघुकथा

मानव की महत्वाकांक्षी अभिलाषा कभी कभी इतनी बलवती हो जाती है कि रिश्तों को काटते काटते खुद एक दिन परिवार रिश्तों और समाज से अलग हो जाता है और फिर एक दिन जिंदगी में ऐसा मुकाम भी आता है कि उसकी अंतरात्मा खुद बोल उठती है कि अपनों का साथ भी जरूरी है।
कबीर एक छोटे से परिवार मे जन्मा पला बढ़ा और ऊंची शिक्षा के साथ साथ बचपना से जवानी की डगर पर कदम रख चुका था माता पिता ने उससे बहुत ही आकांक्षाएं पाल रखी थी कि एक दिन वो बहुत बड़ा सरकारी अफ़सर बन अपने परिवार को मध्यम वर्गीय परिवार से उठा कर एक उच्चस्तरीय श्रेणी में ले जाए।
मगर उसके परिवार की आकांक्षाओं और उच्च श्रेणी में जाने की आशा को उसकी महत्वाकांक्षी अभिलाषा ने ग्रहण कर लिया क्योंकि उसे उससे भी ज्यादा महत्वाकांक्षी महिला का साथ मिल गया वो थी उसकी प्रेमिका कमली..
कबीर तुम मुझे कितना प्यार करते हो .. कमली ने उसके गले में बाहों का हार डालते हुए कहा।
हम एक दूसरे के बिना जीवित नहीं रह सकते .. तुम कहो तो आज ही शादी के रश्मों में बंध जाते हैं .. कबीर ने मुस्कुराते हुए जबाव दिया।
वो तो सत्य है हमारा भी वही हाल है परन्तु अब तुम भी एक अदद उच्च श्रेणी के आफिसर हो और तुम्हारा परिवार अभी भी पुराने ख्याल का ..अगर तुम मेरे साथ रहना चाहते हो तो ..हम शादी के बाद अलग दुनिया बसाएंगे हमारा परिवार से कोई लेना देना नहीं होगा .. कमली ने कहा ।
कोई बात नहीं ..अब आज हमारे पास सब कुछ है फिर परिवार जमाने के पचड़े में क्या पड़ना ..हम जहां होंगे वहीं अपना परिवार और समाज बन जाएगा .. कबीर ने कहा।
शर्तों का प्यार धीरे धीरे जीवन साथी के रूप में बदल चुका था  दुनिया का एशो आराम आज उसके कदमों में थी नौकर चाकर गाड़ी बंगला सभी उसके पास थे।
बचपन के मित्र मानव के समझाने पर कोई असर नहीं हो पा रहा था क्योंकि अब उसके पास दौलत शोहरत ऊंची सोसायटी में उठक बैठक उसके सामने रिश्ते नाते परिवार सब फीका पड़ रहा था 
एक दिन ऐसा भी आएगा कि तू सबकुछ होते हुए भी कुछ नहीं होगा अपने आप को बहुत ही अकेला महसूस करेगा तब कहेगा कि अपनों का साथ भी जरूरी है...मानव ने समझाते हुए कहा।
जबकि जब देखी जाएगी फिलहाल हमें तुम जैसे घटिया और छोटे लोगों की सलाह और उनका पास रहना भी नहीं अच्छा लगता .. कबीर ने मानव की बेइज्जती करते हुए कहा।
मानव समय के अनुकूल व्यवहार न पाकर कभी न पास आने और बात करने की कसम खाकर चला गया।
कबीर और कमली के दो बच्चे थे उनको अच्छी शिक्षा और अच्छी परवरिश के लिए पहले हास्टल और फिर विदेश भेज दिया पढ़ने के लिए..
समय के साथ दोनों बच्चे जवान हो गये और वहीं विदेश मे शादी करके सटल हो गये और कबीर कमली एक तरह से अकेले रह गये.
वक्त के साथ कमली भी उसका साथ छोड़ कर चली गई अब कबीर दुनिया में अकेला रह गया और उसको अब रिश्तों की अहमियत समाज की दूरी परेशान करने लगी।
एक दिन उसने अपने बचपन के मित्र मानव को याद किया मानव आया और एक बार फिर उसे समाज परिवार रिश्तों के अहमियत के बारे में फिर से जुड़ने में उसकी मदद की ।
अपनों का साथ जरूरी है .. आखिर एकबार फिर कबीर को यह बात माननी पड़ी ।

राजन मिश्र
अंकुर इंक्लेव करावलनगर दिल्ली 94

रचना स्वरचित मौलिक अप्रकाशित है ब्लॉग पल पोस्ट करने की अनुमति है

Monday, May 24, 2021

May 24, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन क़लम रथ परिवार
दिनांक-24/05/21
विषय-कसम
विधा -कहानी
सुहाना और रहीम दोनों एक-दूसरे से बेइंतहा मुहब्बत करते थे मगर गांव वालों को उनकी मुहब्बत रास न आई ..
इसलिए गांव वालों ने सरपंच को बुलाकर पंचायत बैठाया दोनों के मां बाप से उनकी रजामंदी जानी गई और पंचायत में सलमा जो कबीर की दोस्त और सुहाना की सहेली थी उसने पंचायत में यह कसम खा लिया कि कबीर और सुहाना आपस में प्यार करते हैं उनको दोनों को सादी करनी चाहिए और सुहाना और रहीम की नहीं ..
पंचायत में इस बात पर बहस छिड़ गई कि जो कसम सलमा ने खाई वह झूठी है या सच्ची ..
अगर सलमा झूठ बोल रही है तो क्यूं .. क्या सलमा सुहाना और कबीर से जलती थी और फिर उसने अपनी मां की झूठी कसम क्यूं खाई..
यह जरूरी नहीं जो कुछ गीता पर हाथ रखकर अदालत में बोला जाए वह सच ही हो ..आज के युग में सच बोलने के लिए बहुत बड़ा जिगर होना चाहिए.. कबीर ने रहीम का हाथ पकड़ते हुए कहा।
क्यों तुम इतने बड़े समझदार कब से होगये कबीर की सच क्या है झूठ क्या है तुम उसे पहचान सको जब अदालत का जज नहीं फैसला कर पाता कि असली सच क्या है बस उसे यह लगता है कि गीता या कुरान पर हाथ रखकर कसम खाने वाला हर इंसान सच ही बोलता होगा बस वही सच मान लेता है ..रहीम ने मुस्कुराते हुए कहा।
कसम तो कोई झूठी क्यूं खाएगा दद्दा..वह भी गीता और कुरान की.. सुन्दर ने कबीर से पूछा ।
यह तो आज कल धंधा सा हो गया है सुन्दर ...यहां कचेहरी में लोग पैसों की लालच में गीता कुरान क्या अपनी औलाद तक की झूठी कसमें खा जाते हैं और उन्हें या उनके परिवार का इसी से भरण पोषण भी चलता है..रहीम ने सुंदर को समझाते हुए कहा ।
भैय्या कसम झूठी है या सच्ची वह तो खाने वाला ही समझ सकता है या फिर ऊपरवाला.. खुद तो मोह माया की लालच में फंसा होता है और ऊपर वाला अपने समय पर ही उसका फैसला करता है.. कबीर ने मुस्कुराते हुए बोला।
मगर यहां बात कुछ दूसरी है कबीर भाई ..न तो यह अदालत है न कोई यहां पर पुलिस की कोई जबरदस्ती फिर सलमा ने क्यों अपनी मां की कसम खाई कि रहीम और सुहाना एक दूसरे को प्यार करते है.. सुन्दर ने रहीम की तरफ इशारा करते हुए कहा।
सलमा ने झूठी कसम इस लिए खाई कि वह कबीर से प्यार करतीं थीं और कबीर उससे नहीं किसी और से प्यार करता था इस जलन में उसने झूठी कसम खा कर रहीम और कबीर में नफरत और दुश्मनी पैदा करना चाहतीं थीं जो कि आपस मे सच्चे मित्र थे ..
कसम तो कसम होती है पर सच्चाई का पता कसम से नहीं खुद की मंजूरी से होती है और हमने कबूल कर लिया कि मैं सुहाना से प्यार करता हूं और यह सत्य है..रहीम ने सभी से हाथ जोड़कर कहा और सुहाना को गले लगा लिया ..
राजन मिश्र 
स्वरचित
अंकुर इंक्लेव
करावलनगर दिल्ली 94

Bookmark Us

Delicious Facebook Favorites More Stumbleupon Twitter

Search