Sunday, October 23, 2022

October 23, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
जय मां शारदे
मंच को नमन
#कलमरथ साहित्य परिवार
#दिनांक :- २३-१०-२०२२
#वार :- रविवार
#विषय :- रूप
#विधा :- कविता 

वह हमेशा ऐसे राहों पर चलती है,
अपने रूप से सारे जग को छलती है।
उसके रूप को देखकर मोहित हो जाते हैं सब,
जब वह जूड़े में गुलाब का फूल लगाकर निकलती है।।

वह अपने रूप से ही जग को मारती है,
वह अपनी निगाहों से कभी नहीं हारती है।
रूबी उसका सुंदर सलोना लगता है,
वह एक नहीं हजारों पर डोरे डालती है।।

उसे अपने रूप पर इतना गुमान क्यों है,
वह इतराकर क्यों चलती है,इतना अभिमान क्यों है।
रूप तो मात्र एक छलावा सा होता है जग में,
इस बात को समझता नहीं, इंसान क्यों है।।

प्रभात राजपूत ''राज''गोंण्डवी
गोंडा-उत्तर प्रदेश
October 23, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
कलमरथ दैनिक आयोजन 2022
दिनांक 23/10/2022
दिन रविवार 
विषय रूप 
विधा कविता 
आयोजक कलमरथ परिवार भारत 

देख कर दर्पण में रूप सलोना ,
मत इतराना अय खिलती कली। 
तेरे इस रूप के दीवाने हैँ बहुत। 
करते हैँ तेरे सुन्दर रूप से प्यार।
वक्त के साथ रूप बदल जाता है़। 
पड़ जाती हैँ गालों में झुर्रियां ,
हो जाते श्वेत केश सिर के। 
कहेगा  देख कर यही दर्पण ,
सुन्दरी आया गया है़ बुढ़ापा। 
देख कर रूप ,अपना दर्पण में। 
हो जाओगी  तुम खफा दर्पण पर। 
मन का रूप होता मधुर 
जो अंत तक रहता सुन्दर। 
रूप पर न कभी इतराना। 

स्वरचित मौलिक अप्रकाशित 
नरेन्द्र श्रीवात्री स्नेह 
बालाघाट म प्र

Tuesday, October 18, 2022

October 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन मंच कमलरथ परिवार
विषय गिरगिट
विधा कविता
दिनांक 18/10/2022

रंग बदलते लोग देखके
गिरगिट भी भौंचक्का है,
इतने रंग न देखे उसने
हर जन ज्यों उचक्का है|

अभिमान को जो पाल रहे
स्वाभिमान उनका छूटा है
शौक के लिए छ्ले लोग को
ईर्ष्या लोभ में जग डूबा है|

गिरगिट तो रंग बदलता
अपनी रक्षा वो करता है,
मैं मेरा केवल मैं के लिए
मनुज कितने रंग बदलता है| 

सरीसृप धूसर वो रंग लिए 
गर्दन उठाके इशारे किए,
सच कहता वो हमने माना है
नेता का रूप आज पहचाना है|

कितने रंग रूप नेता लिए हैं
गिरगिट सीमित ये जग में फैले हैं,
लोभ लालच सत्ता के लिए 
नित नए रंग में बदले हुये हैं|

अपनेपन की बात करते हैं
दिल में कड़वाहट रखते हैं,
मक्कारी के नए पैंतरे आजमाते
चेहरे पे मुस्कुराहट रखते हैं|

सोचा मैंने गिरगिट से सीख लूँ 
रंग बदलने की कला सीख लूँ,
किसी को घाव देने के लिए नहीं
अपने बचाव के लिए सीख लूँ|

रचनाकार का नाम- संजीव कुमार भटनागर
लखनऊ, उ. प्रदेश
मेरी यह रचना मौलिक व स्वरचित है। ब्लॉग में अपलोड की मेरी स्वीकृति है।

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