Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on October 23, 2022 with No comments | Categories: आ0 'प्रभात राजपूत' जी, कविता, रूप
जय मां शारदे
मंच को नमन
#कलमरथ साहित्य परिवार
#दिनांक :- २३-१०-२०२२
#वार :- रविवार
#विषय :- रूप
#विधा :- कविता
वह हमेशा ऐसे राहों पर चलती है,
अपने रूप से सारे जग को छलती है।
उसके रूप को देखकर मोहित हो जाते हैं सब,
जब वह जूड़े में गुलाब का फूल लगाकर निकलती है।।
वह अपने रूप से ही जग को मारती है,
वह अपनी निगाहों से कभी नहीं हारती है।
रूबी उसका सुंदर सलोना लगता है,
वह एक नहीं हजारों पर डोरे डालती है।।
उसे अपने रूप पर इतना गुमान क्यों है,
वह इतराकर क्यों चलती है,इतना अभिमान क्यों है।
रूप तो मात्र एक छलावा सा होता है जग में,
इस बात को समझता नहीं, इंसान क्यों है।।
प्रभात राजपूत ''राज''गोंण्डवी
गोंडा-उत्तर प्रदेश

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