Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on October 18, 2022 with No comments | Categories: आ0 'संजीव कुमार भटनागर' जी, कविता, गिरगिट
नमन मंच कमलरथ परिवार
विषय गिरगिट
विधा कविता
दिनांक 18/10/2022
रंग बदलते लोग देखके
गिरगिट भी भौंचक्का है,
इतने रंग न देखे उसने
हर जन ज्यों उचक्का है|
अभिमान को जो पाल रहे
स्वाभिमान उनका छूटा है
शौक के लिए छ्ले लोग को
ईर्ष्या लोभ में जग डूबा है|
गिरगिट तो रंग बदलता
अपनी रक्षा वो करता है,
मैं मेरा केवल मैं के लिए
मनुज कितने रंग बदलता है|
सरीसृप धूसर वो रंग लिए
गर्दन उठाके इशारे किए,
सच कहता वो हमने माना है
नेता का रूप आज पहचाना है|
कितने रंग रूप नेता लिए हैं
गिरगिट सीमित ये जग में फैले हैं,
लोभ लालच सत्ता के लिए
नित नए रंग में बदले हुये हैं|
अपनेपन की बात करते हैं
दिल में कड़वाहट रखते हैं,
मक्कारी के नए पैंतरे आजमाते
चेहरे पे मुस्कुराहट रखते हैं|
सोचा मैंने गिरगिट से सीख लूँ
रंग बदलने की कला सीख लूँ,
किसी को घाव देने के लिए नहीं
अपने बचाव के लिए सीख लूँ|
रचनाकार का नाम- संजीव कुमार भटनागर
लखनऊ, उ. प्रदेश
मेरी यह रचना मौलिक व स्वरचित है। ब्लॉग में अपलोड की मेरी स्वीकृति है।

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