Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on May 24, 2021 with No comments | Categories: आ0 'नरेन्द्र श्रीवात्री स्नेह' जी, कसम, कहानी
नमन मंच
#कलमरथ परिवार दैनिक आयोजन 2021
#विषय कसम
#विधा कहानी
#शीर्षक कसम
#दिनांक 24/5/2021
#दिन सोमवार
क्रमांक 76
कसम लेना आसान होता है़ पर उसे निभाना कठिन होता है़। ये कहानी है़ मेरी स्वयं की जो मैंने और मेरी पत्नी ने आज से ठीक पचास वर्ष 25मई सन 1972को खाई थी। मैंने अपनी पत्नी श्रीमती कामिनी श्रीवात्री के साथ ली थी।
मैंने अपनी पत्नी से प्यार किया था और हमने कसमें ली थी की हम एक दूसरे का साथ दुख और सुख में साथ निभाएंगे। हमने प्रेम विवाह किया था।
मेरी और कामिनी की जाति अलग अलग थी। समाज उस समय इन बंधनों को कहाँ मानता है़।
हमने अपने गृह नगर जबलपुर से भाग कर अपने परिचित जो कलकत्ता में रहते थे उनके पास गए। वहाँ उनने हमारी शादी अदालत में एक माह बाद करवा दी।
वहाँ के एक जूट मिल के निजी पाठशाला में मुझे शिक्षक की नौकरी मिल गई पर कुछ महीने बाद बिहारी और बंगालियों में विवाद हो गया। वहाँ पर हड़ताल हो गई मिल और पाठशाला भी बन्द हो गई हमारे ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट गया ।हमने हिम्मत नहीं हारी एक दूजे का साथ निभाने की कसम जो खाई थी।
मैंने अपनी बड़ी बहिन और अपने जीजा जी को पत्र लिखा और अपनी पूरी कहानी बताई। जीजा जी का पत्र आया उनने मुझे क्षमा कर अपने पास बुला लिया जहाँ मैंनेपाँच रुपए दिन पर दैनिक मजदूरी में काम मिला। हमने कुछ माह तक काम किया।
रोजगार दप्तर के एक बाबू को जब हमारी कहानी पता चली तो उनने ड्रेसर के प्रशिक्षण का कार्ड निकलवा दिया।तीन माह का प्रशिक्षण मैंने विक्टोरिया अस्पताल जबलपुर से प्राप्त किया। एक सौ दस रुपया मिलता था। बड़ी मुश्किल से गुजारा होता था। कई बार तो भूखे रहने की भी नौबत आईं पर मेरी पत्नी ने अपनी कसम निभाई। पाँच साल बाद मुझे विभागीय फार्मासिस्ट का प्रशिक्षण भोपाल से लिया। और मैं गाँव में नियुक्त हुआ। हमने साथ रहने की कसम खाई थी जो निभा रहे हैं।
आज मेरे परिवार में तीन बहू तीन पुत्र पाँच नाती और एक नातिन है़।
हम अपनी कसम आज भी निभा रहे हैं। कल 25मई को हमारी शादी की पचासवीं साल गिरह है़।
स्वलिखित अप्रकाशित मौलिक सत्य कहानी।
नरेन्द्र श्रीवात्री स्नेह
बालाघाट म. प्र.

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