Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on May 24, 2021 with No comments | Categories: आ0 'एस0 डी0 शर्मा' जी, कसम, लघुकथा
नमन कलमरथ
दिनांक ,24/05/2021
वार सोमवार
आज के संदर्भ में कसम जो खाते है,
वह समझलो सबको धोखा देते हैं।विश्वास में कसम का बजूद नहीं होता वो त़ो उसकी खरी नींव पर चोट पहुंचाते कसमें वादे का खेल कलयुग में ढह गया।
जितनी कसमें लोग खाते हैं 99%झूठी होती इस सम्बंध में एक कहानी प्रस्तुत करता हूं एक अफसर आये दिन टूर बना कर कार्यालय से बाहर जाने का फर्जी टूर दिखाता था जबकि वो उसी शहर में रहकर कार्यालय के आउट हाऊस में ठहर कर गलत कार्यों में लिप्त रहता था।
उसकी वीवी जब भी उससे पूछती तो वह वच्चों की और वीवी की कसम खा लेता था।
एक दिन उसकी बीवी अचानक कार्यालय पहुंची तो पता चला साहब कोई टूर नहीं करते तब जाकर पूछा फिर कहां जाते वह चोकीदार बोला रात को आना रात को वह पहुंच गई देखा आउट हाऊस में मिल गये ,कान पकड़ने लगे वीवी धम्म से भागी घर आई छै माह तक बोल चाल नहीं न कभी टूर बहाना किया न घर छोड़ा बस वीवी ने बोलना छोड़ दिया । यही कहानी है।
स्वरचित एस डी शर्मा
दतिया मध्यप्रदेश
कलमरथ

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