Monday, May 24, 2021

May 24, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in ,
Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on May 24, 2021 with No comments | Categories: ,
नमन मंच
#कलमरथ परिवार दैनिक आयोजन 2021
#विषय- कसम
#विधा -कहानी 
#दिनांक -24/5/2021
#दिन -सोमवार

कॉलेज का आखरी दिन, मैं अपनी सहेलियों के साथ बैठी उनकी डायरियों में संदेश लिख रही थी।एक मित्र ने समोसा पार्टी दी थी, सब खुश भी थे एक नए जीवन मे प्रवेश करने का समय, साथ ही दुखी भी एक दूसरे से बिछड़ने के कारण।मैंने भी सबके लिए कविता लिखी थी, सबको सुनाई, कुछ लोग आत्मविभोर भी हुए, कुछ सिर्फ सुन कर मनोरंजन किए। सबसे मिल कर जब जाने लगी  ऑटो स्टैंड की तरफ ,घर जाने के लिए,अचानक किसी ने मुझे आवाज लगाई। मैं पलटकर देखी। मेरी कक्षा का एक लड़का,जो मेरे मित्रों वाले ग्रुप का सदस्य नहीं था, पीछे खड़ा था।" कैसे हो राज" मैंने पूँछा।
" चलोगी मेरे  साथ गन्ना रस पीने, सामने ही ठेला है" उसने पूँछा।
राज था तो बहुत कंजूस, आज तक किसी को कुछ खिलाया पिलाया नहीं था,इसीलिए उसको किसी भी ग्रुप में शामिल नहीं किया गया था। लंबा, गोरा, माथे पर लटकते बाल, छोटी छोटी नींद में बोझिल सी आकर्षक आँखें, और प्यारी सी मुस्कान।सभी लड़कियाँ उसकी बहुत बातें करती थीं।कभी कभार आकर मुझसे हाल चाल पूँछ लिया करता था।हमने गन्ना रस पिया फिर बातें करने लगे। उसने पूछा अब आगे क्या करने का इरादा है। मैंने कहा शादी।"ऐसे ही किसी से भी कर लोगी बिना जाने समझे"।सब ऐसा ही करते हैं, माता पिता तो देखते ही हैं न,मैंने उत्तर दिया। पर हीरे की परख सिर्फ जौहरी ही कर सकता है, ये बात हमेशा याद रखना।कभी खुद को हीरे से कम नहीं समझना।" जिंदगी में हमेशा खुश रहना और अपनी ये मुस्कुराहट हमेशा संभाल कर रखना, ये वादा कर मुझसे "। मैंने हाँ कहा और घर चली गयी ।उसकी ये बात उस समय तो उतनी समझ में नहीं आई, वो ऐसा क्यों कह रहा था लेकिन शादी के बाद जब भी कभी खुद को अकेला या दुःखी पाया, उसका मुस्कुराता चेहरा और वो बातें हमेशा याद आती और एक नई प्रेरणा और शक्ति दे जाती। आज वर्षों बीत गए, जीवन में कई उतार चढ़ाव आए पर जब जब बिखरने लगी हमेशा वो चेहरा और वो कसम मुझें याद आती रही। लोग कभी न भूलने की कसम दिलाते हैं पर उसकी ये अनोखी कसम हमेशा उसके निष्छल मन और असीमित प्रेम को दर्शाती रही।और मैं खुद को हीरा समझ अपने आप को निखारने की हमेशा ही कोशिश करती हूँ और हमेशा मुस्कुराती हूँ उस कसम का मान रखते हुए।

नीलम द्विवेदी
रायपुर, छत्तीसगढ़।
स्वरचित, मौलिक।

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