Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on May 24, 2021 with No comments | Categories: आ0 'गीता परिहार' जी, कसम, कहानी
नमन मंच
#कलम_रथ _परिवार दैनिक आयोजन 2021
#विषय: कसम
#विधा: कहानी
#दिनाँक:24/5/2021
#दिन: सोमवार
सुहानी ने काजल लगी आंखों को आईने में एक बार फिर संवारा। जिंदगी के आइने में साहिल दिखा,अपने बाहों में भरते हुए।वह उसकी आंखों में आंखें डालते अक्सर उन आंखों की गहराइयों में डूब जाने की बात करता।तब उम्र ही कितनी थी उसकी,अठारह भी पूरे नहीं हुए थे। छुईमुई सी उसकी बाँहों में जा सिमटती थी |
उसकी कसकर बांधी पोनीटेल को खोल कर कहता,खुले बालों में कयामत लगती हो,बाल बांधा मत करो।सुहानी के गाल सुर्ख हो जाते कान की लवें गर्म हो जातीं।वह उसे बेतहाशा प्यार करता।
कुछ ही मुलाकातों के बाद उसने सुहानी को घर से कीमती सामान लेकर भागने के लिए मना लिया।
"देख सुहानी,तेरे मां -बाप तेरी शादी मुझसे कभी न होने देंगे।हम भाग कर शादी कर लेंगे।तू कुछ गहने पैसे ले आना,देख मेरी बात पूरी सुन ,मुझे गलत मत समझना।हम कुछ दिन बाद वापिस आकर तेरे मां -पापा को मना लेंगे।उनसे माफी मांग लेंगे।सब पहले जैसा हो जाएगा।उपर वाले की कसम!कसम पर तो यकीन है ना?"
'मुझे तो तुझ पर रब से भी ज्यादा यकीन है। कसम मेरे सिर की!"
सुहानी को रात प्लेटफार्म पर खाली हाथ देख साहिल के मंसूबों पर पानी फिर गया था।कहां उसने सोचा था..मगर वह हार मान लेने वालों में नहीं था...और
उसने तो पूरी शिद्दत से समर्पण किया था,कितनी मुहब्बत की थी साहिल से!
अतीत की उन कड़वी यादों में गुम आज जब वह फिर आईने के सामने बैठी तो एक-एक बात रील की तरह उसकी आंखों के आगे चलने लगी। पीछा नहीं छोड़ता उसका अतीत!
उसने बालों को कसा, जूडे में बाँधकर गजरा लपेट लिया। होंठों को सस्ती लाली से सुर्ख किया।पाउडर की एक और परत चेहरे पर थपथपाई।आंखों में आंसू झिलमिलाए, कहीं काजल फैल न जाए।मौसी दो बार चिल्ला चुकी है कि ग्राहक आ चुका है।
गीता परिहार
अयोध्या

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