Sunday, October 23, 2022

October 23, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
जय मां शारदे
मंच को नमन
#कलमरथ साहित्य परिवार
#दिनांक :- २३-१०-२०२२
#वार :- रविवार
#विषय :- रूप
#विधा :- कविता 

वह हमेशा ऐसे राहों पर चलती है,
अपने रूप से सारे जग को छलती है।
उसके रूप को देखकर मोहित हो जाते हैं सब,
जब वह जूड़े में गुलाब का फूल लगाकर निकलती है।।

वह अपने रूप से ही जग को मारती है,
वह अपनी निगाहों से कभी नहीं हारती है।
रूबी उसका सुंदर सलोना लगता है,
वह एक नहीं हजारों पर डोरे डालती है।।

उसे अपने रूप पर इतना गुमान क्यों है,
वह इतराकर क्यों चलती है,इतना अभिमान क्यों है।
रूप तो मात्र एक छलावा सा होता है जग में,
इस बात को समझता नहीं, इंसान क्यों है।।

प्रभात राजपूत ''राज''गोंण्डवी
गोंडा-उत्तर प्रदेश
October 23, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
कलमरथ दैनिक आयोजन 2022
दिनांक 23/10/2022
दिन रविवार 
विषय रूप 
विधा कविता 
आयोजक कलमरथ परिवार भारत 

देख कर दर्पण में रूप सलोना ,
मत इतराना अय खिलती कली। 
तेरे इस रूप के दीवाने हैँ बहुत। 
करते हैँ तेरे सुन्दर रूप से प्यार।
वक्त के साथ रूप बदल जाता है़। 
पड़ जाती हैँ गालों में झुर्रियां ,
हो जाते श्वेत केश सिर के। 
कहेगा  देख कर यही दर्पण ,
सुन्दरी आया गया है़ बुढ़ापा। 
देख कर रूप ,अपना दर्पण में। 
हो जाओगी  तुम खफा दर्पण पर। 
मन का रूप होता मधुर 
जो अंत तक रहता सुन्दर। 
रूप पर न कभी इतराना। 

स्वरचित मौलिक अप्रकाशित 
नरेन्द्र श्रीवात्री स्नेह 
बालाघाट म प्र

Tuesday, October 18, 2022

October 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन मंच कमलरथ परिवार
विषय गिरगिट
विधा कविता
दिनांक 18/10/2022

रंग बदलते लोग देखके
गिरगिट भी भौंचक्का है,
इतने रंग न देखे उसने
हर जन ज्यों उचक्का है|

अभिमान को जो पाल रहे
स्वाभिमान उनका छूटा है
शौक के लिए छ्ले लोग को
ईर्ष्या लोभ में जग डूबा है|

गिरगिट तो रंग बदलता
अपनी रक्षा वो करता है,
मैं मेरा केवल मैं के लिए
मनुज कितने रंग बदलता है| 

सरीसृप धूसर वो रंग लिए 
गर्दन उठाके इशारे किए,
सच कहता वो हमने माना है
नेता का रूप आज पहचाना है|

कितने रंग रूप नेता लिए हैं
गिरगिट सीमित ये जग में फैले हैं,
लोभ लालच सत्ता के लिए 
नित नए रंग में बदले हुये हैं|

अपनेपन की बात करते हैं
दिल में कड़वाहट रखते हैं,
मक्कारी के नए पैंतरे आजमाते
चेहरे पे मुस्कुराहट रखते हैं|

सोचा मैंने गिरगिट से सीख लूँ 
रंग बदलने की कला सीख लूँ,
किसी को घाव देने के लिए नहीं
अपने बचाव के लिए सीख लूँ|

रचनाकार का नाम- संजीव कुमार भटनागर
लखनऊ, उ. प्रदेश
मेरी यह रचना मौलिक व स्वरचित है। ब्लॉग में अपलोड की मेरी स्वीकृति है।

Friday, February 18, 2022

February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
#कलम रथ परिवार
#विषय अपनों का साथ जरूरी है
#शीर्षक अपनों से जंग 
#विधा कविता

भले बैर भाव पल रहे जंग नहीं लड़ सकते हैं 
चंद चांदी के सिक्कों पे हम नहीं अड़ सकते हैं

अपनापन अनमोल गायब सदाचार मिलता कहां 
रिश्तो में कड़वाहट घुली वह प्रेम प्यार रहा कहां

एक दूजे को नैन दिखाए भाई से भाई टकराए 
जर जमीन के चक्कर में शह मात सभी खाए

हक औरों का खाकर भी कोई आसमां नहीं चढ़ता 
अपनों से जंग जो पाले दुनिया में कब आगे बढ़ता

प्यार के मोती लुटाओ सद्भावों की गंगा बहा दो 
अपनों से जंग छोड़ो दुनिया में शोहरत पाओ

उच्च विचार रखकर सुधा रस बरस जाने दो 
खुशियों के सुहाने पल अब जिंदगी में आने दो

दुनिया में आनंद बरसे मत करना अपनों को तंग 
सुख दुख में काम आए अपनों से ना लड़ना जंग

अपने अपने ही होते हैं अनजान मत होने देना 
रिश्तों की मधुरता दिल से कभी ना खोने देना

रमाकांत सोनी नवलगढ़
जिला झुंझुनू राजस्थान
February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन कलम रथ परिवार
दिनांक - 18/2/22
विषय - अपनों का साथ जरूरी है।
विधा -लघुकथा

मानव की महत्वाकांक्षी अभिलाषा कभी कभी इतनी बलवती हो जाती है कि रिश्तों को काटते काटते खुद एक दिन परिवार रिश्तों और समाज से अलग हो जाता है और फिर एक दिन जिंदगी में ऐसा मुकाम भी आता है कि उसकी अंतरात्मा खुद बोल उठती है कि अपनों का साथ भी जरूरी है।
कबीर एक छोटे से परिवार मे जन्मा पला बढ़ा और ऊंची शिक्षा के साथ साथ बचपना से जवानी की डगर पर कदम रख चुका था माता पिता ने उससे बहुत ही आकांक्षाएं पाल रखी थी कि एक दिन वो बहुत बड़ा सरकारी अफ़सर बन अपने परिवार को मध्यम वर्गीय परिवार से उठा कर एक उच्चस्तरीय श्रेणी में ले जाए।
मगर उसके परिवार की आकांक्षाओं और उच्च श्रेणी में जाने की आशा को उसकी महत्वाकांक्षी अभिलाषा ने ग्रहण कर लिया क्योंकि उसे उससे भी ज्यादा महत्वाकांक्षी महिला का साथ मिल गया वो थी उसकी प्रेमिका कमली..
कबीर तुम मुझे कितना प्यार करते हो .. कमली ने उसके गले में बाहों का हार डालते हुए कहा।
हम एक दूसरे के बिना जीवित नहीं रह सकते .. तुम कहो तो आज ही शादी के रश्मों में बंध जाते हैं .. कबीर ने मुस्कुराते हुए जबाव दिया।
वो तो सत्य है हमारा भी वही हाल है परन्तु अब तुम भी एक अदद उच्च श्रेणी के आफिसर हो और तुम्हारा परिवार अभी भी पुराने ख्याल का ..अगर तुम मेरे साथ रहना चाहते हो तो ..हम शादी के बाद अलग दुनिया बसाएंगे हमारा परिवार से कोई लेना देना नहीं होगा .. कमली ने कहा ।
कोई बात नहीं ..अब आज हमारे पास सब कुछ है फिर परिवार जमाने के पचड़े में क्या पड़ना ..हम जहां होंगे वहीं अपना परिवार और समाज बन जाएगा .. कबीर ने कहा।
शर्तों का प्यार धीरे धीरे जीवन साथी के रूप में बदल चुका था  दुनिया का एशो आराम आज उसके कदमों में थी नौकर चाकर गाड़ी बंगला सभी उसके पास थे।
बचपन के मित्र मानव के समझाने पर कोई असर नहीं हो पा रहा था क्योंकि अब उसके पास दौलत शोहरत ऊंची सोसायटी में उठक बैठक उसके सामने रिश्ते नाते परिवार सब फीका पड़ रहा था 
एक दिन ऐसा भी आएगा कि तू सबकुछ होते हुए भी कुछ नहीं होगा अपने आप को बहुत ही अकेला महसूस करेगा तब कहेगा कि अपनों का साथ भी जरूरी है...मानव ने समझाते हुए कहा।
जबकि जब देखी जाएगी फिलहाल हमें तुम जैसे घटिया और छोटे लोगों की सलाह और उनका पास रहना भी नहीं अच्छा लगता .. कबीर ने मानव की बेइज्जती करते हुए कहा।
मानव समय के अनुकूल व्यवहार न पाकर कभी न पास आने और बात करने की कसम खाकर चला गया।
कबीर और कमली के दो बच्चे थे उनको अच्छी शिक्षा और अच्छी परवरिश के लिए पहले हास्टल और फिर विदेश भेज दिया पढ़ने के लिए..
समय के साथ दोनों बच्चे जवान हो गये और वहीं विदेश मे शादी करके सटल हो गये और कबीर कमली एक तरह से अकेले रह गये.
वक्त के साथ कमली भी उसका साथ छोड़ कर चली गई अब कबीर दुनिया में अकेला रह गया और उसको अब रिश्तों की अहमियत समाज की दूरी परेशान करने लगी।
एक दिन उसने अपने बचपन के मित्र मानव को याद किया मानव आया और एक बार फिर उसे समाज परिवार रिश्तों के अहमियत के बारे में फिर से जुड़ने में उसकी मदद की ।
अपनों का साथ जरूरी है .. आखिर एकबार फिर कबीर को यह बात माननी पड़ी ।

राजन मिश्र
अंकुर इंक्लेव करावलनगर दिल्ली 94

रचना स्वरचित मौलिक अप्रकाशित है ब्लॉग पल पोस्ट करने की अनुमति है
February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in ,
नमन मंच
कलमरथ परिवार
कलमरथ दैनिक आयोजन 2022
दिनाँक 18/2/2022
दिन शुक्रवार
विषय अपनों का साथ जरूरी है़
विधा कविता
शीर्षक अपनों का साथ जरूरी है़
क्रमांक76

वक़्त आ गया है़ अब ऐसा ,
अपनों से दूर रहा नहीं जाता।
अकेले अब जिया नहीं जाता, 
आती हैं विपदाऐं अनेक।
उस वक़्त याद आते हैं अपने 
लगता तब मन में ,
जो साथ होते अपने।
गले से लिपट कर रो लेते हम।
दो शब्द सांत्वना के कोई कह देता।
गम अपना हो जाता कम।
मुसीबत में अपने ही आते हैं काम।
करते अपने एक दूजे की मदद।
हो जाते हैं पूरे सारे काम।
वक़्त बुरा हो या अच्छा।
अपनों का साथ जरूरी है़।

स्वरचित मौलिक अप्रकाशित रचना। ब्लाग में अपलोड करने की अनुमति है़।
नरेन्द्र श्रीवात्री स्नेह
बालाघाट म. प्र.
February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
जीवन है इक सफर,
और हम सब इसके राही।
चलते जा रहे कर्म को करते,
तृष्णा मन में समाई।
यह भी पाना ,वह भी पाना,
यह सोच कर भागे जा रहे।
छूटते  जा रहे सारे रिश्ते नाते,
फिर भी न हम पछ्ता रहे।
माना व्यस्त हुई ज़िन्दगी ,
न अपनों से हम मिल पाते है।
दिन बीतते है महीनों  में और,
 माह वर्ष है बन जाते है।
करके  अथक परिश्रम गर,
पा भी लेंगे हम बहुत कुछ।
पर अपने ही संग न होंगे,
फिर क्या करेंगे हम सब कुछ।
सच्ची ख़ुशी तब ही मिलेगी,
जब कोई बाँटने वाला हो।
रिश्ते नाते संगी साथी ,
बस संबंधों में अपनापन हो।

नंदिनी लहेजा
रायपुर छतीसगढ़
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित
February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन मंच
कमल रथ परिवार
दिनांक-18-02-2022
विषय अपनों का साथ जरूरी है
विद्या कविता

अकेले जीना आसान नहीं है।
अपनों बिना रहना आसान नहीं है ।
अपनों के संगम करें प्रभु पूरी है।
अपनों का साथ जरूरी है।।

बड़ी परेशानियां अपने मिलें हैं।
पल अपनों की जरूरत होती है।
हमदर्दी से ताकत मिलती पूरी है।
अपनों का साथ जरूरी है।

हर्ष उल्लास सभी कार्य होते।
जब सब अपने साथ होते हैं।
अकेलापन होती मजबूरी है।
अपनों का साथ जरूरी है।

जीवन में अपनों से कैसी  दूरी है।
अपना ही अपने दुख में जरूरी है।
अपनों के सहारे होताअति जरूरी
अपनों   का साथ जरूरी है।।

आलिंगन का एहसास जरूरी है।
अपनी बाहों में यह सुख रसीला है।
 जख्मों को मरहम की मंजूरी है।
 अपनों का साथ जरूरी है।।।

बड़ा कठिन दुनिया में जीना है।
जीवन में परीक्षाये जरूरी है।
अपनों का सिर पर हाथ जरूरी है।
अपनों का साथ जरूरी है।

स्वरचित मौलिक तथा अप्रकाशित
संगीता चमोली देहरादून उत्तराखंड
ब्लॉग हेतु सहमति है
February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
#नमन कलमरथ परिवार
दिनांक-१८/२/२०२२
विषय-अपनों का साथ जरूरी है

अपनों का साथ जरूरी है,

अपनों का साथ जरूरी है
 जाहिर जज्बात जरूरी है।

अपनों का समझो महत्व
मिलना मिलाना जरूरी है।

संबल  देते लेते हैं अपने
मिलना  संबल जरूरी है।

सुख- दुख  में जीवन के
अपनों का,साथ जरूरी है।

भागम भाग की दुनियाँ में
किंतु ठहराव भी जरूरी है।

समझे रिश्तों की अहमियत
अपनों में सौहार्द्र जरूरी है।

अपनों को अपना बना रखिए
सोचें क्या बिखराव  जरूरी है।

रिश्तों में रहे स्नेह सद् भावना
नहीं लगता टकराव जरूरी है।

लता शर्मा
जांजगीर छ ग
स्व लिखित व मौलिक रचना
February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन मंच कमलरथ परिवार
विषय अपनों का साथ जरूरी है
दिनांक 18/2/2022
विधा कविता

अकेले कहा हम जी पायेंगे
अपनों का साथ जरूरी है।
संग होंगे जब अपने फिर तो
हर तकलीफ भी मंजूर है।

दुनिया में जीना नहीं आसान
देने पड़ते हैं हमें तो इम्तिहान
मगर हो जाता है सबकुछ ही
आसान जब सर पर हाथ हो।

बड़ी बड़ी परेशानियां भी हम
कर लेते हैं पार दिल के पास
हो हमारे सभी साथ सभी का
भाये दूर हो जाये हर दर्द ही।

नीरू बंसल हनुमान गढ राजस्थान स्वरचित।ये रचना मौलिक एवं अप्रकाशित है
February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
जय माँ शारदे
# कलमरथ परिवार दैनिक आयोजन
दिन शुक्रवार
दिनांक 18/02/2022
विषय अपनों का साथ जरूरी है।
विधा गद्य और पद्य
............................. ..
शीर्षक महकते रिश्ते 
विधा गद्य
.................मानवीय संवेदना ,भावना, करुणा व्यथा का रिश्तों अभिन्न संबंध रहा है।एकाकीपन मानव जीवन को ऐसे बंजर जमीन पर ला पटक देता है कि जहाँ अपना कहने के लिए कोई नहीं होता है।अकेलेपन मानव मन को अनेकों सवालों से घेरे रहता है।कल क्या होगा, क्या आने वाले कल में उनको कोई साथ देगा,क्या कल कोई अपना कहने वाला भी मिलेगा।बिना रिश्तों की जिन्दगी इतनी बोझिल हो जाती है कि उन को खींचने के लिए शरीर का सारा दम कम पड़ जाता है।अकेले रहते रहते मन तंग हो जाता है।अनेकों दुःचिन्ताएं मन को मथती रहती है।चिंता तो चिता से भी भयावह होतीं है।सुबह वक्त पर आँखें खुल जाय और रात में वक्त पर आँखें लग जाय, यह भी जीने के लिए कम नहीं है, पर एकाकी जीवन में रात रातभर चिंता से नींद नहीं आती है।अतः जिन्दगी की खुशियों के लिए रिश्तों के फूलों की सुगंध चाहिए।रिश्ते सुखद एहसास है, हृदय स्पर्शी कोमल भाव है, अविरल माधुर्य रस भीनी भीनी खुशबू का प्रवाह है, जो तन मन में तरोताजा सुखद उन्माद से तरंग, उमंग ,उत्साह से प्लावित कर देता है।अहले सुबह की पहली किरण जैसे मन को गुदगुदा देती है,।हृदय गगन को झिलमिल सितारे जैसे भाव विभाव,अनुभाव से आलोकित कर देता है।प्रेम प्यार, ममता, स्नेह, वात्सल्य भाव ,अनुराग, से जीवन को मधुरतम रसों से सराबोर कर देता है।अपनों का एहसास सुरभित कुसमित पुष्पों रसों लावण्य माधुर्य की भीनी भीनी सुगंध, धरा के कण कण सेआती सौंधी गंध, जीवन के महकते उपवन की खुशियों भरे फूलों की मुस्कान है।निर्झर के झर झर रव,तितलियों का मनोरम नृत्य, भँवरों मधुर गुंजन, मलयानिल की सुरभित पवन, पराग कणों से महकती बासंती पवन, कोयल की कुहू कुहू तानतन मन में स्पन्दन, मधुर मधु सिहरन  प्रणय प्यार भरे मधुर जीवन के लिए अपनों का साथ जरूरी है।अपनों का साथ एक सुखद कल्पना जैसी, अधरों पर स्मित मुस्कान, कपोलों पर मृदुल चुम्बन है।
बड़े ही मनमोहक, मनभावन रसीले छंदों जैसे रस भरे होठों के मनोरम गीत जैसे, प्रिय के बाँहों का स्पर्श, आलिंगन का एहसास के लिए अपनों का साथ  जरुरी है।इसीलिए हम अपने अपनों को, रिश्तों के मधुरतम बंधनों को निखारें।अपनों का साथ इस जहाँ की जन्नत को खुशनुमा खुशबू से महकाते रहता है।वह खुशनसीब इंसान है, जिन्हें अपनों का साथ मिला है।
....।..................................................मैं, मोहन प्र.यादव, यह मेरी स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित रचना है।ब्लॉग पर अपलोड किया जा सकता है।
मोहन प्र.यादव,
जरदाहा, दुमका, झारखण्ड
पिन 814120
February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमनमंच
#कलमरथ_परिवार 
दिनांक-१८.०२.२०२२
विषय-अपनों का साथ जरूरी है
विधा-कविता(व्यंग्य)
*********************
मजाक अच्छा है
कि अपनों का साथ जरूरी है,
मगर आधुनिकता के इस युग में
सिर्फ मजबूरी है,
सिर्फ अपने स्वार्थ या मजबूरी में
तो ठीक है और जरुरी भी
वरना सिर्फ सीनाजोरी है।
ये मजाक नहीं तो और क्या है
माँ बाप का साथ भी 
आज जरुरी कहाँ है,
साथ है भी तो बड़ी मजबूरी है,
वरना माँ बाप और संतानों के बीच
न मिटने वाली दूरी है।
चलिए मान लिया कि अपनों का साथ जरूरी है
पर अपना कहने और साथ की 
जरूरत से भी अधिक जरूरी है 
अपनों की औकात क्या है?
हमारा अपना स्वार्थ, हमारी अपनी जरुरतें
जो आप से पूरी हो सकती हैं,
आपकी और आपके साथ की
इससे बड़ी जरूरत और क्या हो सकती है?
अपने और अपनों का साथ
सिर्फ छलावा है,
बिना स्वार्थ के अपने और अपनों का साथ
महज दिखावा है।
अब न अपनों की जरूरत है
न अपनेपन का और अपनों के साथ का,
जो स्वार्थ सिद्ध करता रहे हमारा
हमें तो ऐसे ही अपनों के साथ की जरूरत है
बाकी सब अपने और अपनों का साथ
सब गैर जरुरी भी तो है। 

सुधीर श्रीवास्तव
गोण्डा, उत्तर प्रदेश
८११५२८५९२१
© मौलिक, स्वरचित, अप्रकाशित
कलमरथ ब्लॉग में प्रकाशन की स्वीकृति देता हूं।
February 18, 2022 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
कलम रथ परिवार
दिनांक-०९-०१-२०२२
नयी कविता
......…..…....
कुछ तो हुआ
यूं ही नहीं टूटने लगे हम
अपनी शाखाओं से।
जरा सोचो तो
विषम परिस्थितियों में
जिन्होंने हमें
सहारा दिया,
तनकर खड़ा होने से लेकर
सफलता के सोपान तक
पहुंचाने में
हमारा मूलाधार रहा,
आखिर क्यों
भुला दिया आज
उन्हीं संबंधों को।
स्वच्छंद जीवन की
हमारी सोच ने,
खत्म कर दी
रिश्तों की सारी गर्माहट।
जिधर देखो सिर्फ
कड़वाहट ही कड़वाहट।
जूझना होगा हमें,
विषम परिस्थितियों से
देना होगा
अपने खोखले जीवन को
एक नया मोड़।
तभी मिलेगी
बदलते रिश्ते को
 एक अलग पहचान।
सुनील प्रहरी.जमालपुर.मुंगेर.( बिहार)

Friday, June 11, 2021

June 11, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह 1 comment
नमन मंच
#कलमरथ परिवार
कलमरथ महा-प्रतियोगता
दिनांक-0106.2021
दिन-मंगलवार
विषय-भारतीय संस्कृति
विधा-आलेख
✍️🌱🙏🌺✍️🌴🕉🥦🌲✍️⛳🌷🚩🌹🥦🥗☘️
धन्यम ही वर्षम,
धन्या:भारत संस्कृति।
भारतीय जना:धन्य:,
धन्या:स्माकं परंपरा।
जिस धरा का कण कण जीवंत सहस्रों सभ्यताओं का जनक हो,उस भारतीय संस्कृति के बारे में लिखना और व्याख्यान करना बहुत बड़े ज्ञान को संजोए रखनें से कम नहीं है।भारतीय संस्कृति का मूलाधार सदा सैद्धान्तिक और व्यावहारिक दृष्टि से बसुधैव कुटुम्बकम् रहा है।अहिंसा परमो धर्म के सिद्धान्त पर चलकर विश्व की सबसे बड़ी और संघर्षशील लड़ाई जीत कर अपनें लोकतंत्रात्मक शासन की पुनर्स्थापना करने वाला यही भारत है।राम राज्य की परिकल्पना और उसे यथार्थ में परिपालन करना बहुत बड़ी उपलब्धि है।
भारती संस्कृति का मूलाधार वेद और पुराण माने जाते हैं।वहीं से हर प्रकार की साहित्य,संगीत, कला का प्रादुर्भाव होकर विश्व सभ्यताओं को संजोने संवारने का काम किया है।
भारतीय संस्कृति की चार विशेषतायें रही हैं जो प्राचीन काल से मनुष्य के चार पुरूषार्थ बतलाती हैं-
धर्म
अर्थ
काम
मोक्ष
इन चार पुरूषार्थों के बल पर हम अपनें जीवन में कैसे भी कठिन से कठिन कार्यों को सरलता पूर्वक हल कर सकते हैं।
इसी प्रकार इस नाशवान देह के पालन पोषण के लिए भी चार आश्रमों को बतलाया गया है ताकि अवस्था के अनुसार हम अधिक अशक्तता के चक्कर में ना पड़ें।यह इस प्रकार से है-
ब्रह्मचर्य
गृहस्थ
वानप्रस्थ
सन्यास
संयुक्त परिवार प्रथा हमारी संस्कृति की देन है, विश्वभर में हमारी उतम जीवन शैली- "सादा जीवन उच्च विचार" के मंत्र को विश्व के अनेक देशों ने अपना लिया है।इस देश ने पूर्व पाषाण काल से और आज तक क ई सभ्यताओं को जन्म दिया है।त्रेता से कलयुग की लंबी यात्रा करते कभी थके हारे नहीं।राम और कृष्ण,राम और रहीम,अल्लाह और यीशु,गौतम और महात्मा बुद्ध का यह देश विविधता में एकता का प्रतीक होनें के साथ बाघ और बकरी एक ही तालाब में एक साथ पानी पीने वालों का यतार्थ उदाहरण मौजूद हैं।
अंत में मैं यही कहूंगा कि यह विविधताओं में एकता का प्रतीक है जिसनें सारे विश्व का समय-समय पर नेतृत्व कर नयी राह एवं नये आयाम दिये हैं।साहित्य, संगी,कला,गायक,वादक,नारी पराक्रम, नारी सम्मान, विज्ञान,नवीन अन्वेषक आदि महत्वपूर्ण कार्यों में भारतीय संस्कृति एक जीवंत रूप है और रहेगा।

                 सर्वथा मौलिक अप्रकाशित 
                  मगनेश्वर नौटियाल"बट्वै" 
                            श्यामांगन 
        भेटियारा/कालेश्वर,उतरकाशी,उतराखण्ड

मैं मगनेश्वरनौटियाल"बट्वै"घोषणा करता हूँ कि यह आलेख मेरी स्वरचित ए्वं अप्रकाशित है

Thursday, June 10, 2021

June 10, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
नमन मां शारदे!
नमन कलमरथ परिवार
कलमरथ महा प्रतियोगिता २०२१
दिनांक- ०१.०६.२०२१
दिन- मंगलवार
विषय/शीर्षक - भारतीय संस्कृति
विधा- आलेख

      संस्कृति शब्द कृ धातु से बना है, संस्कृति शब्द किसी देश या किसी  समाज की मूल विशिष्टताओं को अपने में समेटे हुये अन्तर्निहित शक्तियों व गुणों को प्रकट करने का नाम है।
       भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन एवं सुसमृद्ध संस्कृति है और आज भी अपनी विशिष्टताओं के साथ अजर-अमर बनी हुई है, अपनी संस्कृति को ही विश्व की सभी संस्कृतियों की जननी माना जाता है।
धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष की प्राप्ति को भारतीय संस्कृत का मूल मंत्र माना जाता है हमारी संस्कृति प्राचीन होते हुए भी नवीन विविधताओं के साथ आज के समय में भी हम सभी का मार्गदर्शन करती है क्योंकि हमारी संस्कृति समस्त मानव जाति के कल्याण के लिए ही बनी है तभी कई देशों के तमाम आघात सहने के बाद भी अक्षुण्ण बनी हुई है।
   हमारी संस्कृति में "नर और नारी को एक समान" मानते हुए भी नारी के सम्मान को अधिक महत्व दिया गया है कहा भी गया है-
 "यत्र नार्यन्ते पूज्यंते तत्र देवता रमंते"
   हमारी संस्कृति "वसुधैव कुटुंबकम्" की भावना लेकर चलती है,हमारी संस्कृति में "मानव मात्र एक समान" की भावना रखते हुए सभी को अपना मानते हुए सभी के साथ एक समान व्यवहार करती है और सभी देशों की संस्कृतियों की विशेषताओं को अपने अंदर समाहित करते हुए उनकी संस्कृति का भी सम्मान करती है तभी तो हमारा देश धर्मनिरपेक्ष देश कहलाता है।
       प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति समन्वयवादी,सशक्त एवं जीवंत रही है प्राचीन होने के साथ-साथ आज के समय में भी अपनी नवीन विशेषताओं के कारण आज के युवाओं के बीच शोध का विषय बनी हुई है आज के परिपेक्ष्य में भी हर कसौटी पर खरी उतरती है क्योंकि हमारी संस्कृति में जीवन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण के समन्वय के साथ आध्यात्मिक प्रवृत्ति की विचारधारा का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। 
  प्रारंभ से ही हमारे ऋषि-मुनि शारीरिक व मानसिक शुद्धता का ध्यान रखते जप-तप एवं योग को अधिक महत्व दिया है।
    अत: हम कह सकते हैं कि हमारी संस्कृति का कोई तोड़ नहीं इसे सुरक्षित रखना हमारा कर्तव्य है अपने घर में,समाज में,समूह में धार्मिक कृत्यों के द्वारा अपने बच्चों को अपनी संस्कृति के बारे में समय-समय पर समझाते रहना चाहिए ताकि हमारे बच्चे अपनी  संस्कृति की अक्षुण्ता बरकरार रखते हुए आने वाली भावी पीढ़ी को हस्तांतरित कर सकें।

मैं "साधना राठी" गुवाहाटी निवासी मेरी यह रचना स्वरचित,मौलिक एवं अप्रकाशित है।


************************************************************
#नमन #कलमरथ
#कलमरथ_महा_प्रतियोगिता_2021
#दिनांक :- 01/06/2021
#विषय :- #भारतीय_संस्कृति
#विधा :- #आलेख
#शीर्षक :-#भारतीय_संस्कृति_की_विशेषताएँ
****************************
भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम व सबसे महान संस्कृति है। इसका विकास देशकाल व परिस्थितियों के अनुकूल मानव उत्पत्ति के साथ-साथ हुआ।
            भारतीय संस्कृति वेदों की देन हैं। वेदों में वर्णित सत्य, अहिंसा, धर्म (कर्तव्य), प्रेम, श्रद्धा आदि भारतीय संस्कृति के आधार हैं। हमारी संस्कृति नैतिकता सिखाती है। हमें किस प्रकार मानवधर्म का पालन करना है, यह बतलाती है। इन्हीं गुणों के आधार पर भारत को विश्वगुरु कहा गया है।
  भारतीय संस्कृति का एक मजबूत आधार वैज्ञानिक भाव भी है। भारतीय संस्कृति में उपजते परंपराएँ वैज्ञानिक आधार लिए हुए है। विज्ञान, ज्योतिषशास्त्र व गणित के क्षेत्र में विश्व की सभी महान उपलब्धियाँ भारत के नाम हैं।  शून्य की खोज महान गणितज्ञ आर्यभट्ट के नाम है। यद्यपि हवाई जहाज आदि के खोज का दावा पश्चिमी देश कर रहे हैं किंतु ये सब प्राचीन समय में भारत के पास उपलब्ध थे। पुष्पक विमान इसका उदाहरण है। चिकित्सा व शल्य क्षेत्र में भी भारत सबसे आगे था।
    किंतु विदेशी आक्रांताओं ने  भारतीय उपलब्धियों को बहुत नुकसान पहुँचाया। उनके द्वारा वेद, आयुर्वेद, पुराण आदि ग्रंथों को नुकसान पहुंचाया गया। इन विदेशी आक्रमणकारियों को भारत में शासन करने में भारतीय संस्कृति बाधक लगी। अतः उन्होंने भारतीय संस्कृति को समाप्त करने का बहुत प्रयास किया। भारतीय पद्धति पर चलने वाले शिक्षण संस्थाएँ प्रतिबंधित कर दी गई। धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचाया गया। भारतीय संस्कृति को समाप्त करने के लिए भारतीय संस्कृति में जातिवाद, क्षेत्रवाद, भेदभाव व अनेक कुप्रथाओं को जन्म दिलाया गया। भारतीय संस्कृति को समाप्त करने के लिए हिंसा व प्रलोभन आदि का भरसक प्रयास किया गया। भारतीय संस्कृति यद्यपि इन विदेशी आक्रांताओं से कुछ आहत हुई किंतु भारतीय मनीषियों व अच्छे संस्कारों ने आज भी भारतीय संस्कृति को बचाया हुआ है, बल्कि अब हमारी संस्कृति और भी मजबूत हो चली है।
       यद्यपि भारत में अनेक धर्म, रीति-रिवाज, भेषभूषा, विभिन्न भाषाएँ, परंपराएँ व विभिन्न खान-पान पाये जाते हैं, किंतु वाह्य व आंतरिक दृष्टि से सब एक हैं। अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति की महानतम् विशेषता है। सभी देशवासियों को भारतीय होने पर गर्व होता है। विभिन्न धर्मावलंबी होने के वाबजूद सभी नागरिक मिलजुलकर रहते हैं, एक-दूसरे के त्यौहारों में शरीक होते हैं, खुशी मनाते हैं। एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं। धर्मनिरपेक्षता भारतीय संस्कृति की एक और विशेषता है। इसके अतिरिक्त सत्य, अहिंसा, दया, देशप्रेम आदि भारतीय संस्कृति में आज मजबूत आधार हैं। किंतु कुछ विदेशी व शांति के दुश्मन ताकतों को भारतीय एकता देखी नहीं जा रही है वे षड्यंत्र के तहत भारत में धार्मिक उन्माद फैलाने व आतंकवाद फैलाने का असफल प्रयास कर रहे हैं। लेकिन भारतीय संस्कृति के सामने उन्हें हर बार ही घुटने टेकने ही होते हैं।
     अंत में मैं कहना चाहूँगा कि भारतीय संस्कृति महान थी, महान है और महान रहेगी। रामराज अवश्य स्थापित होगा। हम विश्व के फिर से गुरु बनेंगे। भारतीय संस्कृति और मजबूत होगी।
                 #समाप्त 
**************************
स्वरचित /मौलिक
#घोषणा :- मैं भाष्कर बुड़ाकोटी "निर्झर" मेरी यह रचना मौलिक व अप्रकाशित है।
भाष्कर बुड़ाकोटी "निर्झर"
पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखंड)

************************************************************
************************************************************
नमन मंच
कलमरथ महा प्रतियोगिता 2021
दिनांक 1.05.21
विषय भारतीय संस्कृति
विधा आलेख
भारतीय संस्कृति का स्मरण होते ही मन के भीतर
जग की जगमग करती ज्योत से उजाला होता है।
इस ज्योत ने ही सम्पूर्ण विश्व में भारतीय संस्कृति के 
दर्शन कराकर सबका ध्यान भारत की ओर सहसा
आकर्षित किया था। भारतीय संस्कृति आज के दौर
में भी हष्ट-पुष्ट है।उसे कदापि कमजोर नहीं आंका
जा सकता है। भारतीय संस्कृति के मूल से ही अन्य
संस्कृतियों का उदय हुआ है। कभी भारतीय संस्कृति
ने नकल का काम नहीं किया क्योंकि हमारी संस्कृति
अपने आप में ही सबल सशक्त और समृद्ध रहीं हैं।
भारतीय संस्कृति कभी डांवाडोल नहीं रहीं हैं। एक
बात भारतीय संस्कृति में रेखांकित करते हुए खुशी
है कि इतनी विविधता यहां समाई हुई है लेकिन फिर
भी हमारी संस्कृति की गहरी बुनियाद की वजह से
वह आज भी कायम है। विभिन्न क्षेत्रों में निवासरत
अलग-अलग समुदायों में विभिन्न प्रकार की विचारधारा
का एक ही जगह पर उनका एकत्रीकरण निश्चित तोर
पर भारतीय संस्कृति के मस्तक पर तिलक लगाने के साथ
चार चांद लगाता है। यूं देखा जाए तो भारतीय संस्कृति
समय-समय पर अन्य संस्कृतियों से आहत जरूर हुई
परंतु हिमालय की तरह अडिग रहकर अस्तित्व को संरक्षित रखने में कामयाब हुई है। मां भारती के विशाल हृदय का इसे पुण्य प्रताप ही कहिए कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी भारतीय संस्कृति ने बखूबी अपने
आप को उजड़ने से बचाया है। वर्ग वर्ण धर्म और भाषाओं
के अद्भुत मिश्रण से सुसज्जित भारतीय संस्कृति किसी
स्वर्ण या रत्न जड़ित आभूषण से कहीं से कहीं तक कम
नहीं है। भारतीय संस्कृति एक गुलदस्ता है जिसमें जातियां
धर्मो क्षेत्रिय भाषाओं और रीति-रिवाजों की भरमार रही हैं।एक कोस पर तो कभी एक क्षेत्र में तथा यहां से होकर
विभिन्न स्थानों पर डेरा डाले भारतीय संस्कृति कुछ कुछ बयां करती आगे सरपट बढ़ती चली गई।कदम कदम पर
भाषा अलग अलग रीति-रिवाजों के अलग-अलग इलाकों
झंडा वरदार कहीं जलवायु का अंतर तो कहीं पर परिधानों
और पहनावे का तरीका।खान पान और बनाने के तरीके
बोली चाली की शैली भारतीय संस्कृति के दिव्य प्रकाश से आलोकित करतें हैं। समय-समय पर भारतीय संस्कृति पर
विभिन्न संस्कृतियों ने प्रभाव डालने की नाकामी भरी कोशिश की। भारतीय संस्कृति में अतिथि देवो भव के भाव
हैं। अनेकता में एकता की मज़बूत नींव पर खड़ी हैं हमारी
संस्कृति। हिमालय गर्व से खड़ा हैं ऊंचा सिर करके। संयुक्त
परिवार में आज भी लोग रहकर वासुदेव कुटुंबकम् के
सिद्धांत का पालन करके गौरवान्वित महसूस करते हैं। योग अध्यात्म आयुर्वेद धर्म शास्त्र आदि आज भी हमारे
ब्रह्मास्त्र है। आधुनिक परिवेश में हमारी भारतीय संस्कृति
को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए हमें कटिबद्ध होना होगा।
हमें गर्व है भारतीय संस्कृति पर शर्म भी आती है क्योंकि
अब पश्चिमी हवा के शिकार हम होने लगें हैं।अगर भारतीय
संस्कृति को पुनः अतीत के गौरव से मुखातिब करना है तो
हमें हमारे देश की निर्मित वस्तुओं का उपयोग करने में ही
भलाई है। आज हमारी संस्कृति पुनः किसी रूप में आयातित होती है तो हम खिंचे चले आते हैं।आओ आंखें मसल कर नहीं खोलकर सुनहरे भविष्य के सपने बुने।
जय हिन्द जय भारत जय भारतीय संस्कृति।

रचनाकार  
डा वीरेन्द्र कुमार सेठिया इंदौर मप्र
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित।
************************************************************
************************************************************
जय मां शारदा 
कलम रथ परिवार मंच को नमन
दिनांक 1 जून 2021
आयोजन कलम रथ महा प्रतियोगिता 2021
विषय भारतीय संस्कृति 
विधा आलेख
प्रमाणित किया जाता है कि यह रचना स्वरचित मौलिक और अप्रकाशित है।
                 भारतीय संस्कृति पर प्रकाश डालने से पूर्व हमें यह देखना होगा की संस्कृति क्या है।
 संस्कृति वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी जाति देश व समाज के भव्य व्यक्तित्व का निर्माण होता है ।और जिसके द्वारा उसकी जीवन की पद्धति रीति रिवाज आचार विचार व्यवहार आदि विशेषताओं की अलग से पहचान बनती है।
इस प्रकार निष्कर्ष निकलता है कि संस्कृति के अंतर्गत सामाजिक व्यवहार धर्म दर्शन कला साहित्य आदि सभी जीवन मूल्यों का समावेश होता है।
अब हम मूल विषय पर आते हैं भारतीय संस्कृति विश्व की अन्य संस्कृतियों की अपेक्षा अधिक गरिमामय एवं मौलिक है। विश्व आज भी भारतीय संस्कृति की ओर आकर्षित हो रहा है। इस्कान आदि के मंदिरों से यह बात सिद्ध हो जाती है। भारतीय संस्कृति सर्वधर्म समभाव की है यहां पर धार्मिक कट्टरता की अपेक्षा सहिष्णुता, सभी धर्मों के प्रति समभाव ,आध्यात्मिक भावना, अहिंसा, पुनर्जन्म में विश्वास ,नैतिक मूल्य ,जीवन मूल्य ,सकारात्मकता, मानवीय संस्कार आदि आते हैं
 वैसे देखा जाए तो हमारी भारतीय संस्कृति की परम विशेषता हम इसकी वर्णाश्रम व्यवस्था को दे सकते हैं। वर्णाश्रम व्यवस्था में प्रत्येक वर्ण का निर्धारण उसके कर्म के अनुसार माना गया। हालांकि समय के साथ अब इसमें भी परिवर्तन आ गया है। वर्णाश्रम व्यवस्था में हमारे जीवन को ब्रह्मचर्य आश्रम ,गृहस्थ आश्रम ,वानप्रस्थाश्रम और सन्यास आश्रम इन चार भागों में बांट कर प्रत्येक आश्रम के क्या कर्तव्य हो सकते हैं उन्हें क्या करना चाहिए इन बातों का निर्धारण किया गया है।
भारतीय संस्कृति को हम समन्वय वादी कह सकते हैं हम देखते हैं यहां पर आत्मा परमात्मा जैसे दर्शनशास्त्र की प्रवृत्ति दिखाई देती है। 
इसके समन्वयात्मक होने के कारण ही हम देखते हैं कि भारतीयों के जीवन में ज्ञान भक्ति कर्म धर्म शील सत्य  और सदाचार  का  खुला मिला झूला रूप दिखाई देता है।
अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण भारत की सभ्यता और संस्कृति का विदेशों में भी प्रसार हुआ। जैन धर्म बौद्ध धर्म की स्थापना हुई। 
यहां विभिन्न धार्मिक मान्यताएं हैं विभिन्न मत हैं विभिन्न वाद हैं फिर भी यहां के जीवन में वैमनस्यता की स्थिति नहीं आई ।इतिहास को उठाकर देखें तो यहां अनेक विदेशी आक्रांता जातियां भी आकर भारतीय संस्कृति को अपनाने लगी।
अंत में हम कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति अतीव गरिमामयी है। अनेक विशेषताओं को अपने में समाहित किए हुए हैं ।
यदि हम अपने देश और समाज का हित चाहते हैं जो भारतीय संस्कृति के आदर्शों और मूल्यों को अपने जीवन में उतारना होगा।
मंजु माथुर                  अजमेर राजस्थान
************************************************************
************************************************************
#नमन_कलमरथपरिवार
#दि0-01/06/21
#विषय- भारतीय संस्कृति 
#विधा- आलेख
 #सम्यक्_कृतिः_संस्कृतिः अथवा #संस्कृति_संस्करणम् अर्थात् संस्कारित, परिमार्जित करना ही संस्कृति कहलाती है।संस्कृत में #सम्_उपसर्ग_पूर्वक_डुकृञ्_करणे धातु से महर्षि पाणिनी के #स्त्रियां_क्तिन् सूत्र से क्तिन् प्रत्यय होकर संस्कृति शब्द की निष्पत्ति होती है।डा0कपिल देव द्विवेदी ने भारतीय संस्कृति को परिभाषित करते हुए कहा कि---
#सत्याहिंसागुणैःश्रेष्ठा_विश्वबन्धुत्व_शिक्षिका।
#विश्वशान्ति_सुखादात्री_भारतीया_हि_संस्कृतिः।।
वस्तुतःभारतवर्ष की संस्कृति विश्व में सर्वश्रेष्ठ है,जो सत्य,अहिंसा आदि गुणों के द्वारा श्रेष्ठतमा है।विश्वबन्धुत्व की संपोषिका है,और विश्वशांति की सुखदात्री है।हम जानते हैं कि भारतीय संस्कृति के मूलतः चार सिद्धान्त बताये गये हैं,जो विश्वशांति का मार्ग प्रशस्त करने में पूर्णतया सक्षम और समर्थ हैं।
*01- #वसुधैव_कुटुम्बकम्-समूचा विश्व एक परिवार व कुटुम्बवत् है।
*02- #एकं_सद्विप्रा_बहुधा_वदन्ति-सत्य एक है विद्वान लोग इसे विभिन्न माध्यमों से कहते हैं।
*03- #सर्वे_भवन्तु_सुखिनः- सभी का कल्याण हो,सभी सुखी होवें(आज के संदर्भ में हम इसे ही #सबका_साथ_सबका_विकास कहकर सबके कल्याण की बात कहते हैं)
*4 #यद्_पिण्डे_तद्_ब्रह्माण्डे-जो पिण्ड में विद्यमान है वही ब्रह्माण्ड है।साधारणतया प्रश्न उठता है कि संस्कृति मने क्या?संस्कृति चाहे कोई हो,कहीं की भी हो,उसका मूल लक्ष्य परिष्कृत,परिमार्जित और संस्कारित करना है।संस्कृति दुर्भावनाओं का शमन करती है,साम्यत्व भावना की संस्थापना करती है।संस्कृति ही जीवनोन्नति में सहायक होती है,सद्गुणों को प्रदान करती है,सच्चरित्र की निर्मात्री है और सद्कर्मों को करने की सद्प्रेरणा प्रदान करती है।वही सद्ज्ञान समाज व राष्ट्र का अभ्युदय करता है।जैसा कि कहा गया है कि---#भारतस्य_प्रातिष्ठे_द्वे_संस्कृतं_संस्कृतिस्तथा"जिसके द्वारा हम सांस्कारिक मूल्यों को जानते हैं,सीखते-सिखाते हैं।इसी महान विचार को भारतवर्ष के महान ऋषियों,मुनियों,शिक्षाविदों,चिन्तकों ने आगे बढाया है जिसका परिणाम यह है कि आज भी भारतीय संस्कृति जीवन्त है।
      वास्तविकता यह है कि भारतीय संस्कृति की तीन विशिष्ट गुण हैं।
भारतीय संस्कृति #कर्म_प्रधान संस्कृति है,मिश्र मेसोपोटेमिया की समकालीन समझी जाती है,और बाकी शेष संस्कृतियाँ बाद की हैं।दूसरी विशेषता भारतीय संस्कृति की #अमरता है जिसे मो0इकबाल ने आपने काव्य में लिखा है। #यूनान_मिश्र_रोमा_सब_मिट_गयेजहां_में-परन्तु भारतीय संस्कृति आज भी विद्यमान है।तीसरी विशेषता भारत का #जगद्गुरु होना है।हम आज भी देखते हैं कि भारतीय संस्कृति में सर्वांगीणता,विशालता,विश्वबंधुता,औदार्यता,सहिष्णुता और प्रेम रचा-बसा है।आप मौजूदा समय में वैश्विक महामारी कोविड के संत्रास से दुनिया त्राहि-त्राहि कर रही थी,जबकि भारत स्वयं इससे अछूता नही था तब भी भारत ने मैत्री,मानवता,संवेदनशीलता दिखाते हुए कोविशील्ड और कोवैक्सीन सहित तमाम जरुरी चीजों को दुनिया को देकर #वसुधैव_कुटुम्बकम् को चरितार्थ किया,जिसका प्रतिफल हमें भी संकट के समय मिला।हमारा देश बहुविध भाषी देश है,बहुत सी परंपरायें,खान-पान-रहन-सहन,पहनावा,आदि पृथक-पृथक होते हुए भी #एकात्मवाद को और राष्ट्रवाद को मूल मानते हैं।अनेकता में एकता का भाव ही भारतीय संस्कृति का मूलाधार है जो हमें दुनिया में वैशिष्ट्य प्रदान करती है।
#आलेखक-रोशन बलूनी
कोटद्वार पौडीगढवाल 
      उत्तराखण्ड
@..copyright act..
#घोषणा-मेरा यह आलेख मूल 
और अप्रकाशित है।
************************************************************
************************************************************
सादर नमन आदरणीय मंच
#कलमरथ_परिवार
दिनाँक - 01/06/2021
दिन -  मंगलवार 
विषय - भारतीय संस्कृति
विधा - आलेख

            "भारतीय संस्कृति"

        भारतीय संस्कृति के बारे में सोचते ही एक विशाल सांस्कृतिक परिदृश्य मानस पटल पर उभर आता है। भारतीय संस्कृति व सभ्यता विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं समृद्ध संस्कृति व सभ्यता है। इसे विश्व की सभी संस्कृतियों की जननी कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं है। कला, ज्ञान-विज्ञान, राजनीति, खेल-कूद, खान-पान, रहन-सहन सभी  क्षेत्रों में भारतीय संस्कृति का सदैव विशिष्ट स्थान रहा है। आज भी भारतीय संस्कृति व सभ्यता के दर्शन न्यूनाधिक रूप में सम्पूर्ण भारतवर्ष में होते हैं।
          किसी भी देश की संस्कृति उस देश की जाति और समुदाय की आत्मा होती है। संस्कृति से ही देश, जाति या समुदाय के उन समस्त संस्कारों का बोध होता है जिनके सहारे वह अपने आदर्शों, जीवन मूल्यों, आदि का निर्धारण करता है। संस्कृति संस्कार भी है। कहा जा सकता है कि संस्कृति वह है जो हम हैं। भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। कई भारतीय इतिहासवेत्ता  तो भारतीय संस्कृति को विश्व की सर्वाधिक प्राचीन संस्कृति मानते हैं।
             भारतीय संस्कृति का सर्वाधिक व्यवस्थित रूप हमें सर्वप्रथम वैदिक युग में प्राप्त होता है। वेद विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ माने जाते हैं।भारतीय संस्कृति  "वसुधैव कुटुंबकम् " की विचारधारा का समर्थन करती है और इसके निर्वहन के लिए भरसक प्रयास भी करती है।
     भारतीय संस्कृति में जहाँ स्वस्थ रहने के लिए योग, यम, तप, नियम जैसी व्यवस्थाएं बनी हैं, वहीं स्वस्थ शतायु जीवन जीने के लिए आश्रम व्यवस्था भी की गई थी, और उसका समय भी निर्धारित किया गया था।आश्रम व्यवस्था का पालन करते हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र है।
     भारतीय संस्कृति पर वर्तमान  युग में सामाजिक आचार-विचार पर पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव पड़ा। संयुक्त कुटुंब प्रथा के स्थान पर परिवारों का पृथक्करण होने लगा। यूरोपीय पुनर्जागरण में नए-नए अन्वेषण और अविष्कार हुए, धर्म और दर्शन का नया संस्करण सामने आया।
कला और विज्ञान के नवीन साधना का श्रीगणेश हुआ, राजनीतिक तथा समाज व्यवस्था में मौलिक क्रांति का सूत्रपात हुआ। अतः इसके परिणामस्वरूप पश्चिमी यूरोप एवं एशिया (भारत) में एक नवीन चेतना का संचार हुआ।   समाज में महिला को उचित स्थान मिला। अर्थात् बदली हुई संस्कृति में महिलाओं के प्रति सोच बदली अब उसे सशक्तिकरण की ओर ले जाने के प्रयास किये जाने लगे।
         संस्कृति के नए स्वरूप में गाँवों की संस्कृति को छोड़कर शहरीकरण देखा गया। इस पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा। शहरीकरण से पलायन भी देखा गया। इस प्रकार लोग पुरानी संस्कृति को छोड़कर आधुनिक संस्कृति को अपनाने लगे ।
                अंततः यही कहा जा सकता है कि.. "यूनान मिश्र रोमा सब मिट गये जहाँ से " किन्तु भारतीय संस्कृति न्यूनाधिक परिवर्तन के साथ निश्छल अडिग और अचल खड़ी रही अपनी अब तक की यात्रा में। महान भारत की महान संस्कृति को श्रद्धानवत नमन।
                        ✍️ नरेश चन्द्र उनियाल,
                     पौड़ी गढ़वाल उत्तराखण्ड।

सर्वथा मौलिक एवं अप्रकाशित।
                        ✍️ नरेश चन्द्र उनियाल।
************************************************************
************************************************************
नमन मंच
कलमरथ परिवार
दिनांक-01/06/2021
वार-मंगलवार
शीर्षक-कलमरथ महा-प्रतियोगिता
विषय-भारतीय संस्कृति
विद्या-आलेख

भारतीय संस्कृति हमारे जीवन का मूल आधार है यह पूरे विश्व में भारतीय संस्कृति अपनी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण उद्देश्य धार्मिक संस्कार शिष्टाचार प्रेम शांति करुणा क्षमाशीलता सहिष्णुता तहजीब सभ्य संवाद है|
भारतीय मतलब भारत का वासी और संस्कृति मतलब,संस्कार सुधार परिवार शुद्धि यह संस्कृति किसी भी देश के धर्म जाति समुदाय की आत्मा कहलाती है एवं संस्कृति से ही देश के जातियों एवं समुदाय के सभी समस्त संस्कारों का बोध होता है जिसके सहारे मनुष्य सामाजिक जुड़ाव एवं दूसरों के प्रति सम्मान की भावना वा एक दूसरे के अधिकार के बारे में अच्छी भावना रखते हैं एवं अपने आदर्शों एवं जीवन मूल्यों का निर्धारण कर भारतीय संस्कृति को बनाए रखते है|
हमारा भारत देश अपनी भारतीय संस्कृति के नाम से जाना जाता है यहां पर अलग-अलग परंपराओं वाले भोजन कपड़े आदि से संबंधित लोग यहां रहते हैं वा विभिन्न प्रकार के समुदायों जाति के लोग अपनी संस्कृति व परंपरा को निभाते हुए यहां स्वतंत्र पूर्वक रहते हैं यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में एकता के संबंधों का अस्तित्व मिलता है|
भारतीय संस्कृति सिंधु घाटी के दौरान बनी वा आगे चलकर वैदिक युग में विकसित हुई बौद्ध धर्म वा स्वर्ण युग की शुरुआत उसके अस्तगमन के साथ फली फूली वा अपनी प्राचीन विरासत को शामिल किये हुए हैं|
भारतीय संस्कृति पूरे विश्व में प्रसिद्ध है वा प्राचीन संस्कृति के रुप में देखा जाता है|भारतीय संस्कृति समन्वित रूप सांस्कृतिक भाषा के रूप द्वारा जैसे-विभिन्न प्रकार की कलाओं मूर्तिकला नृंत्यकला चित्रकला लोकसंस्कृति आदि रामायण महाभारत गीता कालिदास-भवभूति-भास के काव्य और नाटकों के माध्यम से व्यक्त किया जाता रहा है विभिन्न प्रकार के कलाएं एवं भाषाएं भारतीय बगीचे के अनमोल फूल बनें हुए है |
वर्तमान में कुछ नकारात्मक घटनाओं वा प्रभावों ने जो धुंध हमारी संस्कृति वा हमारे जीवन शैली पर डाली है उसे सावधानी पूर्वक हटाना होगा एवं अतीत की संस्कृति की धरोहर को हम सबको सवारना एवं सहेजना होगा उसकी मजबूत आधारशिला की न्यू रखकर हमें नई संस्कृति को निर्मित कर विकसित करना होगा|

मौलिक व अप्रकाशित रचना 
तारा देवी पटेल प्रयागराज
************************************************************
************************************************************
नमन मंच
कलमरथ महा - प्रतियोगिता 
बिषय -भारतीय संस्कृति
विधा - आलेख

प्राचीनतम समृद्ध और सर्वोत्तम संस्कृति पूरे विश्व में हमारी है, ऋषि मुनियों की वाणी, वेद पुराण, धर्म ग्रंथ तथा उत्तम आचार,विचार और संस्कार के कारण ही। विश्व गुरु का गौरव हासिल था । आज भी 
हमारी संस्कृति बदलते वक्त के साथ अपनी परंपरागत अस्तित्व की जीवंतता को कायम रखने में सफल है ।

हमारी संस्कृति ही एक ऐसी संस्कृति है जिसमें हम मानते है -
1. अतिथि देवो भव:
2. सर्वे भवंतू सुखिन:
3. यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, तत्र रमंते देवता
4. विविधता में एकता
5. वसुधैव कुटुंबकम
6.बुर्जुगों का सम्मान
7.आध्यात्मिक दर्शन
8.सात्विक आहार
9.त्योहार का दार्शनिक महत्व
10.समानता, सद्भावना आदि ।

कई धर्मों, परंपरा,भाषाओं को सहेजने वाली संस्कृति जहाँ हम पेड़,पौधा, नदी,जीव जन्तु अर्थात प्रकृति के हम पुजारी है ।हमारा रहन सहन,वेषभूषा सब हमारी कला और संस्कृति को दर्शाती है । त्योहार का भी अपना ही महत्व है, रबी फसल के बाद होली, बैशाखी आदि, खरीफ के बाद मकर,पोंगल आदि,यानि हर त्योहार की अपनी बिशेषता है जिसका वैज्ञानिक आधार है ।

हमारी संस्कृति एक अनमोल धरोहर है, ज्ञान का अद्भुत भंडार है,लेकिन आज पाश्चात्य संस्कृति की मिलावट के कारण हमारी संस्कृति विकृत होती जा रही है ।
संस्कार खोते चले जा रहे हैं जिसे हम आधुनिकता का नाम दे रहे हैं ।
अंत में ,अपनी संस्कृति को बचाये रखना हम सब की जिम्मेदारी है ।जीवन को सुसज्जित,
परिष्कृत, परिमार्जित कर अपनी जड़ों से जुड़े रहना, हम सब का ध्येय होना चाहिए ।

ज्योति सिंह
मेरी रचना स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित है ।
************************************************************
************************************************************
#नमन_कलमरथपरिवार
#दि0-01/06/21
#विषय- भारतीय संस्कृति
#विधा- आलेख
शीर्षक: भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ 
भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं समृद्ध संस्कृति है। जहां अन्य देशों की संस्कृतियाँ तो समय के साथ नष्ट होती रही हैं, भारत की संस्कृति आदि काल से ही अपने परम्परागत अस्तित्व के साथ अजर-अमर बनी हुई है। इकबाल ने लिखा था-
यूनान ओ मिस्र ओ रूमा सब मिट गए जहाँ से, अब तक मगर है बाक़ी नाम-ओ-निशाँ हमारा 
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा 
विदेशियों ने अनेक बार आक्रमण कर संस्कृति को नष्ट करने की कोशिश की, लेकिन वो संस्कृति को न मिटा सके बल्कि अपने साथ विभिन्न प्रकार के धर्म और सम्प्रदाय लेकर यहीं पर बस गये| विभिन्न वेद शास्त्र हमारी संस्कृति का हिस्सा है, जिसके कारण भारत ने जगद्गुरू का नाम पाया| अतिथि देवो भवः, सामाजिक आचार व्यवहार, शरणागत रक्षा, सर्वधर्म समभाव, वसुधैव कुटुम्बकम,अनेकता मे एकता जैसी अन्य प्रमुख विशेषताएँ हैं| बड़ो की इज्जत, छोटो के प्रति स्नेह आचरण, महिलाओ और बुजुर्गो के प्रति विशेष सम्मान हमारा परम धर्म है| वैश्विक महामारी कोविड के समय, जब भारत स्वयं इससे अछूता नही है, तब भी भारत ने मैत्री, मानवता, संवेदनशीलता दिखाते हुए वेक्सीन सहित तमाम जरुरी चीजों को दुनिया को देकर वसुधैव_कुटुम्बकम् को चरितार्थ किया | भारत में प्रकृति को हर तरह से पूजा गया है, चाहे वह वायू, जल, पृथ्वी, अग्नि, आकाश, पहाड़, जीव जन्तु या हमारी वन्य सम्पदा| भारतीय संस्कृति में तैंतीस कोटी ईश्वर स्वरूप का वर्णन है| यहाँ कोटी का मतलब प्रकार से है न कि करोड़ से, जो एक मिथ्या प्रचार है| 5000 वर्षों का इतिहास लिए मानवीय संस्कृतियों में यह चीन के संग विद्यमान है| जहां चीन ने अपनी संस्कृति को कठोरतम नियमों से सुरक्षित रखा है, भारत ने इसे समावेशिता के सिद्धान्त से अक्ष्क्षुण और प्रगतिशील बनाया है| भारतीय संस्कृति दीर्घकालीन स्थायित्व के साथ सतत और व्यापक है| इसकी उदारता व सहिष्णुता की नीति, एकात्मकता, दार्शनिकता एवं अध्यात्मिकता, सत्य, अहिंसा और कर्म प्रधान विशेषताएँ सभी संस्कृतियों से बेहतर बनती है| जीवन का बहुमुखी विकास भारतीय संस्कृति का प्रमुख लक्ष्य रहा है, आश्रम प्रणाली भी इसी व्यापक दृष्टिकोण का प्रमाण है। भारतीय संस्कृति मे आध्यात्मिकता पर बल दिया गया परन्तु साथ ही सांसारिक सुखों की अवहेलना भी नही की गई है, न ही धर्म या संस्कृति के नाम पर कभी कोई बन्धन लगाये गए। इसीलिए हिन्दू धर्म को धर्म न कहकर मूल्यों पर आधारित एक जीवन-पद्धति की संज्ञा दी गई है। इसके लचीले स्वरूप को जड़ता की स्थिति से बचाने में बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, कबीर, गुरु नानक, चैतन्य महाप्रभु, स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द आदि द्वारा किये गए प्रयास, भारतीय संस्कृति की महत्त्वपूर्ण धरोहर बन गए। भारतीय संस्कृति ने एक महासागर कि भांति सभ्यता के प्रारंभ से ही भिन्न-भिन्न प्रकार के विचारों व कला शैलियों के बीच समन्वय करते हुये जो अच्छा मिला उसे ग्रहण किया। भारत में इस्लामी और ईसाई संस्कृति का प्रभाव मिलता है। इसके बावजूद अपना पृथक अस्तित्व रखते हुये नवागत संस्कृतियों से अच्छी बातें ग्रहण करने में भारतीय संस्कृति ने संकोच नहीं किया। वैदिक काल से लेकर आज तक भारतीय विद्वान और चिंतक कर्म के सिद्धांत को विशेष महत्व देते आए है। ये सभी विशेषताएँ भारतीय संस्कृति को युग-युगों से सुरक्षित रखने और यहाँ की सभ्यता को चिरस्थायी बनाए रखने में सर्वविदित रही है। 
रचनाकार का नाम- संजीव कुमार भटनागर
मुंबई, महाराष्ट्र.
मेरी यह रचना मौलिक व अप्रकाशित है।
************************************************************
************************************************************
#नमन_कलमरथपरिवार
#दि0-01/06/21
#विषय- भारतीय संस्कृति
#विधा- आलेख
शीर्षक: भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ 
भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं समृद्ध संस्कृति है। जहां अन्य देशों की संस्कृतियाँ तो समय के साथ नष्ट होती रही हैं, भारत की संस्कृति आदि काल से ही अपने परम्परागत अस्तित्व के साथ अजर-अमर बनी हुई है। इकबाल ने लिखा था-
यूनान ओ मिस्र ओ रूमा सब मिट गए जहाँ से, अब तक मगर है बाक़ी नाम-ओ-निशाँ हमारा 
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा 
विदेशियों ने अनेक बार आक्रमण कर संस्कृति को नष्ट करने की कोशिश की, लेकिन वो संस्कृति को न मिटा सके बल्कि अपने साथ विभिन्न प्रकार के धर्म और सम्प्रदाय लेकर यहीं पर बस गये| विभिन्न वेद शास्त्र हमारी संस्कृति का हिस्सा है, जिसके कारण भारत ने जगद्गुरू का नाम पाया| अतिथि देवो भवः, सामाजिक आचार व्यवहार, शरणागत रक्षा, सर्वधर्म समभाव, वसुधैव कुटुम्बकम,अनेकता मे एकता जैसी अन्य प्रमुख विशेषताएँ हैं| बड़ो की इज्जत, छोटो के प्रति स्नेह आचरण, महिलाओ और बुजुर्गो के प्रति विशेष सम्मान हमारा परम धर्म है| वैश्विक महामारी कोविड के समय, जब भारत स्वयं इससे अछूता नही है, तब भी भारत ने मैत्री, मानवता, संवेदनशीलता दिखाते हुए वेक्सीन सहित तमाम जरुरी चीजों को दुनिया को देकर वसुधैव_कुटुम्बकम् को चरितार्थ किया | भारत में प्रकृति को हर तरह से पूजा गया है, चाहे वह वायू, जल, पृथ्वी, अग्नि, आकाश, पहाड़, जीव जन्तु या हमारी वन्य सम्पदा| भारतीय संस्कृति में तैंतीस कोटी ईश्वर स्वरूप का वर्णन है| यहाँ कोटी का मतलब प्रकार से है न कि करोड़ से, जो एक मिथ्या प्रचार है| 5000 वर्षों का इतिहास लिए मानवीय संस्कृतियों में यह चीन के संग विद्यमान है| जहां चीन ने अपनी संस्कृति को कठोरतम नियमों से सुरक्षित रखा है, भारत ने इसे समावेशिता के सिद्धान्त से अक्ष्क्षुण और प्रगतिशील बनाया है| भारतीय संस्कृति दीर्घकालीन स्थायित्व के साथ सतत और व्यापक है| इसकी उदारता व सहिष्णुता की नीति, एकात्मकता, दार्शनिकता एवं अध्यात्मिकता, सत्य, अहिंसा और कर्म प्रधान विशेषताएँ सभी संस्कृतियों से बेहतर बनती है| जीवन का बहुमुखी विकास भारतीय संस्कृति का प्रमुख लक्ष्य रहा है, आश्रम प्रणाली भी इसी व्यापक दृष्टिकोण का प्रमाण है। भारतीय संस्कृति मे आध्यात्मिकता पर बल दिया गया परन्तु साथ ही सांसारिक सुखों की अवहेलना भी नही की गई है, न ही धर्म या संस्कृति के नाम पर कभी कोई बन्धन लगाये गए। इसीलिए हिन्दू धर्म को धर्म न कहकर मूल्यों पर आधारित एक जीवन-पद्धति की संज्ञा दी गई है। इसके लचीले स्वरूप को जड़ता की स्थिति से बचाने में बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, कबीर, गुरु नानक, चैतन्य महाप्रभु, स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द आदि द्वारा किये गए प्रयास, भारतीय संस्कृति की महत्त्वपूर्ण धरोहर बन गए। भारतीय संस्कृति ने एक महासागर कि भांति सभ्यता के प्रारंभ से ही भिन्न-भिन्न प्रकार के विचारों व कला शैलियों के बीच समन्वय करते हुये जो अच्छा मिला उसे ग्रहण किया। भारत में इस्लामी और ईसाई संस्कृति का प्रभाव मिलता है। इसके बावजूद अपना पृथक अस्तित्व रखते हुये नवागत संस्कृतियों से अच्छी बातें ग्रहण करने में भारतीय संस्कृति ने संकोच नहीं किया। वैदिक काल से लेकर आज तक भारतीय विद्वान और चिंतक कर्म के सिद्धांत को विशेष महत्व देते आए है। ये सभी विशेषताएँ भारतीय संस्कृति को युग-युगों से सुरक्षित रखने और यहाँ की सभ्यता को चिरस्थायी बनाए रखने में सर्वविदित रही है। 
रचनाकार का नाम- संजीव कुमार भटनागर
मुंबई, महाराष्ट्र.
मेरी यह रचना मौलिक व अप्रकाशित है।
************************************************************
************************************************************
🙏नमन कलम रथ परिवार 🙏
विषय:- भारतीय संस्कृति 
विधा:- आलेख
दिनांक:-01/06/2021
      भारत की संस्कृति विश्व की एक महानतम संस्कृति मानी जाती है। कहा जाता है कि भारतीय संस्कृति मेसोपोटामिया, मिस्र और चीन की संस्कृति से भी पुरातन संस्कृति है।भारतीय संस्कृति अद्भुत तो है हीं साथ हीं साथ अपनी महानता और विशेषता के लिए भी अमर है। 
     भारतीय संस्कृति की सबसे अद्भुत विशेषता यह है कि यह "वसुधैव कुटुबंकम" को आत्मसात करती है। जहाँ पूरा विश्व अपनी स्वार्थ सिद्ध करने में आतुर रहती है वहीं भारतीय संस्कृति सभी प्राणियों को एक समान मानती है। ये अपितु वर्तमान की हीं बात नहीं बल्कि इसका आभास हमें प्राचीन काल से हीं प्रतीत होती है। चाहे सिंधु घाटी सभ्यता के काल की बात हो या उसके बाद के काल की यह अपनी विलक्षण प्रतिभा के आधार पर पूरे विश्व का ध्यान अपनी ओर खींचती रही है। भारत का सनातन धर्म यहीं से विकसित बौद्ध धर्म या जैन धर्म के साथ साथ इस्लाम धर्म को भी मार्ग दर्शन करती रही है ।
     भारतीय संस्कृति की दुसरी सबसे अद्भुत विशेषता है कि यह प्राचीन काल से हीं "अहिंसा" और "बंधुत्व " को महत्वपूर्ण मानती रही है। अहिंसा के हीं प्रभाव में आकर मौर्य युगीन सम्राट अशोक ने अंततः जीव हत्या को एक अपराध घोषित किया और जीव हत्या पर प्रतिबंध लगाया था । बाद के भी कालों में अन्य सम्राटों ने भी अहिंसा को परम धर्म माना । 
      भारतीय संस्कृति में सभी प्राणियों को धरती माता के संतान के रुप में परिभाषित किया है और यहीं से जन्म होता है बंधुत्व का।हमारे ऋषि महर्षियों ने इसी का प्रतिपादन कर मानवता और बंधुत्व को सर्वोपरि सिद्धांत बताया है।धरती, नदियों और गौ को माता का स्वरूप मानते हुए कहा है:- " जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी" अर्थात माता और मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी बढ़कर होता है।
      भारतीय संस्कृति की तीसरी सर्व प्रमुख विशेषता है कि अनेकता में एकता।भारत वर्ष में विभिन्न धर्म के लोगों के साथ साथ विभिन्न जातियाँ,विभिन्न समुदाय के लोग एक साथ भाईचारा के साथ रहते हैं।यहाँ कितनी हीं भाषा बोलने वाले लोग रहते हैं परंतु सभी आपस में सामंजस्य स्थापित कर भारत को अग्रसर करने में सहायक हैं। विभिन्न प्रकार के पहनावा,विभिन्न प्रकार के भोजन,विभिन्न प्रकार की वनस्पतियाँ भी भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषताएं है। 
     निषकर्षत: हम कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति बहुत हीं लचीला ,सहिष्णु के साथ साथ ग्रहणशील भी है।सहिष्णु तो इतना कि भारत में सभी धर्मों को समान अधिकार प्राप्त है।भारतीय संस्कृति अध्यात्मिकता के साथ साथ भौतिकता पर भी विशेष ध्यानाकर्षित करती है।हमारी संस्कृति में धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष को मानव का चार पुरुषार्थ माना गया है। इह लोक के साथ साथ परलोक की भी कामना की जाती रही है। जीवात्मा को शांति मिले इसका भी उपाय किया जाता रहा है।भारत की संगीत, कला और साहित्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिकता और भौतिकता के संबंध को समझने में सहायता मिलती है।भारतीय संस्कृति के विषय में मै विजय कुमार पाठक " द्विज " कह सकता हूँ कि:-

 भारत की संस्कृति ,है भारत की पहचान,
मानवता ,बंधुत्व अरु अहिंसा है प्रतिमान,
भगवान  हैं  बसते  यहाँ  कण -  कण  में,
इह लोक,परलोक का मिलता दिव्य ज्ञान ।। 

स्वरचित , मौलिक व अप्रकाशित रचना
विजय कुमार पाठक "द्विज"
मेदनीनगर , झारखंड
************************************************************
************************************************************
नमन मंच
#कलमरथ परिवार
कलमरथ महा-प्रतियोगता
दिनांक-0106.2021
दिन-मंगलवार
विषय-भारतीय संस्कृति
विधा-आलेख
✍️🌱🙏🌺✍️🌴🕉🥦🌲✍️⛳🌷🚩🌹🥦🥗☘️
धन्यम ही भारत वर्षम,
धन्या:भारत संस्कृति।
भारतीय जना:धन्य:,
धन्या:स्माकं परंपरा।
जिस धरा का कण कण जीवंत सहस्रों सभ्यताओं का जनक हो,उस भारतीय संस्कृति के बारे में लिखना और व्याख्यान करना बहुत बड़े ज्ञान को संजोए रखनें से कम नहीं है।भारतीय संस्कृति का मूलाधार सदा सैद्धान्तिक और व्यावहारिक दृष्टि से बसुधैव कुटुम्बकम् रहा है।अहिंसा परमो धर्म के सिद्धान्त पर चलकर विश्व की सबसे बड़ी और संघर्षशील लड़ाई जीत कर अपनें लोकतंत्रात्मक शासन की पुनर्स्थापना करने वाला यही भारत है।राम राज्य की परिकल्पना और उसे यथार्थ में परिपालन करना बहुत बड़ी उपलब्धि है।
भारती संस्कृति का मूलाधार वेद और पुराण माने जाते हैं।वहीं से हर प्रकार की साहित्य,संगीत, कला का प्रादुर्भाव होकर विश्व सभ्यताओं को संजोने संवारने का काम किया है।
भारतीय संस्कृति की चार विशेषतायें रही हैं जो प्राचीन काल से मनुष्य के चार पुरूषार्थ बतलाती हैं-
धर्म
अर्थ
काम
मोक्ष
इन चार पुरूषार्थों के बल पर हम अपनें जीवन में कैसे भी कठिन से कठिन कार्यों को सरलता पूर्वक हल कर सकते हैं।
इसी प्रकार इस नाशवान देह के पालन पोषण के लिए भी चार आश्रमों को बतलाया गया है ताकि अवस्था के अनुसार हम अधिक अशक्तता के चक्कर में ना पड़ें।यह इस प्रकार से है-
ब्रह्मचर्य
गृहस्थ
वानप्रस्थ
सन्यास
संयुक्त परिवार प्रथा हमारी संस्कृति की देन है, विश्वभर में हमारी उतम जीवन शैली-"सादा जीवन उच्च विचार "के मंत्र को विश्व के अनेक देशों ने अपना लिया है।इस देश ने पूर्व पाषाण काल से और आज तक क ई सभ्यताओं को जन्म दिया है।त्रेता से कलयुग की लंबी यात्रा करते कभी थके हारे नहीं।राम और कृष्ण,राम और रहीम,अल्लाह और यीशु,गौतम और महात्मा बुद्ध का यह देश विविधता में एकता का प्रतीक होनें के साथ बाघ और बकरी एक ही तालाब में एक साथ पानी पीने वालों का यतार्थ उदाहरण मौजूद हैं।
अंत में मैं यही कहूंगा कि यह विविधताओं में एकता का प्रतीक है जिसनें सारे विश्व का समय-समय पर नेतृत्व कर नयी राह एवं नये आयाम दिये हैं।साहित्य, संगी,कला,गायक,वादक,नारी पराक्रम, नारी सम्मान, विज्ञान,नवीन अन्वेषक आदि महत्वपूर्ण कार्यों में भारतीय संस्कृति एक जीवंत रूप है और रहेगा।

                 सर्वथा मौलिक अप्रकाशित 
                  मगनेश्वर नौटियाल"बट्वै" 
                            श्यामांगन 
        भेटियारा/कालेश्वर,उतरकाशी,उतराखण्ड

मैं मगनेश्वरनौटियाल"बट्वै"घोषणा करता हूँ कि यह आलेख मेरी स्वरचित ए्वं अप्रकाशित है
************************************************************
************************************************************
#नमन मंच-कलमरथमहा प्रतियोगिता 2021
दिनांक-01-06-2021
विषय-
भारतीय संस्कृति 
विद्या- "आलेख" 
शीर्षक- भारतीय संस्कृति 

संस्कृति हमारे जीवन की अनमोल धरोहर हैं, संस्कृति से ही हमारे जीवन का तानाबाना सुचारू रूप से कार्य करता है। जिस प्रकार शरीर  को जीवित रखने के लिए भोजन की
आवश्यकता होती है वैसे ही अपनी धरोहर व सभ्यता को बचाने के लिए संस्कृति की। 
       और पूरे विश्व में भारतीय संस्कृति की तो क्या कहने। भारतीय संस्कृति  में संस्कृत का समावेश उसे सोने पर सुहागा बनाता है।प्राचीन काल से संस्कृत भारतीयों की शिक्षा- दीक्षा, व धर्म का अनुयायी रहा है। हम भारतीयों में इसी संस्कृत में वर्णित ॠगवेद,यजुर्वेद,सामवेद व अथर्ववेद के मंत्रो  व धर्म के समावेश से एक अलौकिकता को प्राप्त किया हुआ है। भारतीय संस्कृति में "वसुधैव कुटुंबकम् " का मूल मंत्र निहित है। जिसका अर्थ होता है की समस्त "विश्व परिवार है"  इस एक मंत्र से आप भारतीय संस्कृति की महानता को समझ सकते हैं। जहां सभी के मंगल की कामना व परोपकार की भावना है जहां राम जैसे पुरुषोत्तम हुए।जिनकी महिमा युगो युगो तक हमें धर्म पर चलना सिखाती है।
          भारतीय संस्कृति में नारी को देवी स्वरूप माना गया है "यत्र पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमते देवता" श्लोक से ही आप इसकी महानता को देख समझ सकते हैं,यहाँ आज भी लोग अपने कर्तव्य को सर्वोपरि मानकर बड़ो का आदर व छोटो को प्यार देते हैं व जहां "अतिथि देवो भव"
अर्थात मेहमान ईश्वर के समान होता है की भावना है ,जिस प्रकार यहाँ की जलवायु में विविधता है वैसे ही यहाँ के लोगो के रहन सहन ,बोलचाल , व त्योहारों में भी विविधता होते हुए भी एकता  है। रामायण व रामचरितमानस भारतीयों का प्रमुख ग्रंथ है वैसे तो यहाँ  कई ग्रंथ है पर रामचरितमानस का भारतीय जनमानस में विशेष महत्व है। यहां सभी धर्मों को एक समान समझा जाता है।
      प्राचीन काल से ही भारत विश्व गुरु रहा यहाँ तक्षशिला नालंदा  का विश्वविद्यालय विश्व की सबसे पहली व प्राचीन विश्वविद्यालय है। हमारी संस्कृति सबसे प्राचीन है यहाँ के लोग खेती बाड़ी  
पर मुख्यतः आश्रित हैं।और धरती ही हमारी माता है । 
       भारतीय संस्कृति को थोड़े शब्दों में बांधना बहुत ही कठिन है।

स्वरचित अप्रकाशित - वन्दना सिंह-वाराणसी 

यह मेरी मौलिक व अप्रकाशित रचना है।
************************************************************
************************************************************
सादर नमन मंच 🙏
#कलमरथ साहित्य परिवार 
#महा प्रतियोगिता
#दिनांक 01/06/2021
#वार मंगलवार 
#विषय भारतीय संस्कृति 
#विधा आलेख 

संस्कृति शब्द का सामान्य आशय संस्कारित, परिमार्जित व परिष्कृत जीवन-मूल्यों एवं आदर्शों को जीवन में आचरण करने से है जिसका अनुकरण कर उस राष्ट्र के आदर्श नागरिक एक सभ्य व संयमपूर्ण जीवन यापन करने में सक्षम होते हैं।व्यापक अर्थों में संस्कृति राष्ट्रीय अस्मिता के सर्वसम्मत मानदंडों की प्राणवाहिका कही जा सकती है।भारतीय सनातनी संस्कृति विश्व की समस्त सभ्यताओं की एकमात्र अग्रगामी द्युति है।भारतीय सांस्कृतिक वैशिष्ट्य के चरमोत्कर्ष का अवलोकन कर देवता भी स्वर्ग की अपेक्षा भारतभूमि पर जन्म लेने की कल्पना करते है। 
          भारतीय संस्कृति की समृद्धि के कारण ही भारत विश्व गुरु कहलाया।धर्म ही इसका मूल आधार है और भारतीय जीवन-दर्शन का प्राण है।"आत्मवत सर्वभूतेषु" संसार के प्राणीमात्र में अपनेपन का अनुभव करना इस संस्कृति का मुख्य सिद्धांत है।"उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम"के सिद्धांत के आधार पर सारे विश्व को एकता के सूत्र में बांधकर, सम्पूर्ण प्राणीजगत के प्रति सम्मान और उदारता की भावना जगाने का सदैव प्रयत्न करती है। समन्वय की भावना ने भारतीय संस्कृति को अजर अमर बना दिया है।अनेक संस्कृतियाँ इस भूधरा पर आयी,विकसित हुई और मिट गयी लेकिन भारतीय संस्कृति आज भी अपनी पीयूष धारा से जन जन को सिक्त करती हुई प्रवाहशील है।भारतीय संस्कृति ने सदैव संसार को कर्तव्य, संयम,प्रेम और त्याग का मार्ग दिखाया है।समष्टिगत भावनाओं को लेकर चलने वाली "जियो और जीने दो" हमारी भारतीय संस्कृति का मुख्य संदेश है।मुझे मेरी भारतीय संस्कृति पर गर्व है।

डाॅ.नीलम कालरा
जयपुर, राजस्थान 
मौलिक एवं अप्रकाशित
************************************************************
************************************************************
नमन मंच 🙏
कलमरथ महा प्रतियोगिता
#विघा : गघ (आलेख)
#शीर्षक : हमारी संस्कृति हमारी धरोहर
#विषय : भारतीय संस्कृति
दिनांक : 1.6.2021

#हमारी_संस्कृति_हमारी_धरोहर

भारत... संस्कृतियों से समृद्ध एक महान देश है। जिसकी नींव ही #वसुधैव_कुटुंबकम पर टिकी हुई है। अर्थात संपूर्ण विश्व एक कुटुंब/परिवार के समान है। इस कारण बिना किसी भेदभाव के #सर्वे_संतु_सुखीना_सर्वे_संतु_निरामया: (सब सुखी हो सबका कल्याण / विकास हो) को ध्यान में रखकर ही सामाजिक मूल्यों का निर्माण किया गया है। भारत पूरे विश्व के समक्ष #अनेकता_में_एकता का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करने वाला एकमात्र ऐसा देश है जहां हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी, जैन, बौद्ध आदि धर्मों का समावेश है। अलग-अलग रीति-रिवाज, परंपराएं, खानपान, वेशभूषा, मान्यताएं, सिद्धांत होने के बावजूद, प्रत्येक नागरिक सर्वप्रथम भारतीय हैं। उच्च सोच होने के कारण हम भारतवासी एक साथ मिलकर एक दूसरे की संस्कृति को अपनाते हैं तथा त्योहारों व खानपान का आनंद लेते हैं। हमारे संविधान में भी प्रत्येक नागरिक को अपना धर्म चुनने व उसका पालन करने की संपूर्ण आजादी दी गई है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन और महान संस्कृति के रूप में जानी जाती है। 
किसी भी देश की संस्कृति वहां के लोगों की जीवनशैली, न्याय, सिद्धांत, मान्यताएं, धर्म-दर्शन, कला, हस्तशिल्प, वेशभूषा, व्यवहार आदि के द्वारा अभिव्यक्त होती है। मनुष्य अपनी बुद्धि का प्रयोग करके इन क्षेत्रों में जो सृजन करता है तथा अपने सामूहिक जीवन को सुखमय बनाने के लिए जिन सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक प्रथाओं को विकसित करता है। वही उस देश की संस्कृति बन जाती है। आने वाली पीढ़ी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में उस देश की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है।
हमारी भारतीय संस्कृति पूर्णरूपेण मानवता व अध्यात्म पर केंद्रित है। प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वरीय वास होने की मान्यता के कारण #अहिंसा_परमो_धर्म का पालन करना, अपने से बड़ों का मान-सम्मान करना, पैर छूना, नमस्कार करना, ईश्वर में आस्था रखना, व्रत, स्नान, पूजा-अर्चना, जनेऊ धारण करना, आदि संस्कार बचपन से ही आने वाली पीढ़ी में रोप दिए जाते हैं। भारतीय संस्कृति को विश्व में आतिथ्य सत्कार के लिए भी जाना जाता है।  #अतिथि_देवो_भव: की मान्यता पर अतिथि को भगवान तुल्य मान उसका आदर-सत्कार, मान-मनोहर  संपूर्ण विश्व में एक मिसाल बन गया है। जो हमें दूसरे देशों से एक अलग पहचान देता है। यहां का हस्तशिल्प, लोक नृत्य, लोक संगीत आतिथ्य में चार चांद लगा देते हैं। जिसे किसी के लिए भी अपने स्मृति पटल से हटा पाना संभव नहीं है। 
मुझे अपनी भारतीय संस्कृति पर बहुत गर्व है। हम सब भारतवासियों का यह कर्तव्य है कि हम अपने नैतिक व मानवीय मूल्यों को हमेशा याद रखें। सच्चे देशभक्त होने के नाते अपने देश की सांस्कृतिक धरोहर को संजोकर रखें ताकि आने वाली भावी पीढ़ी को सहर्ष सौपे सकें।

#स्वरचित: #डॉ_शिखा_नागर
गाजियाबाद (उ.प्र)
मैं डाॅ.शिखा नागर गाजियाबाद (उ.प्र) से। 
मेरी यह स्वरचित रचना मैलिक वह अप्रकाशित है।
1.6.2021
************************************************************
************************************************************
नमन🙏
कलमरथ दैनिक आयोजन 2021
दिनांक : 01.06.2021
विषय : भारतीय संस्कृति
विधा : आलेख
शीर्षक: हमारी संस्कृति हमारा गौरव
 
अनेकता में एकता लिए भारतीय संस्कृति सबसे समृद्ध और सारे विश्व से अलग है।हमारी संस्कृति के कारण ही हमारा देश विश्व गुरु बनने के कगार पर है।

भारतीय संस्कृति और सभ्यता विश्व की प्राचीन सभ्यता में एक है।भारत की संस्कृति में अनेक रीति - रिवाज भाषाएं प्रथाएं और परंपराएं हैं,जो एक दूसरे से परस्पर संबंधों में महान विविधताओं का अद्वितीय उदाहरण पेश करती हैं।हमारी संस्कृति में आध्यात्मिकता है।

भारतीय संस्कृति गतिशील है और यह मानव सभ्यता की शुरुआत तक जाती है।यह सिंधु घाटी की रहस्यमई संस्कृति से शुरू होती है और भारत के दक्षिणी इलाकों में किसान समुदाय तक जाती है।संस्कृति किसी भी देश जाति और समुदाय की आत्मा होती है।

भारतीय संस्कृति के मूल विशेषता यह है कि हजारों वर्षों के बाद भी यह संस्कृति आज भी अपने मूल स्वरूप में जिंदा है।

विश्व की धरोहर भारतीय संस्कृति के चारों वेद हैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। हमारी संस्कृति यज्ञ हवन,तप और धर्म को महान कार्य के अंतर्गत लेती है। वेद पुरातन ज्ञान का आपार भंडार है। जिसमें ज्ञान ,विज्ञान और भविष्य संबंधित बातों का जिक्र है।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि एक ब्रिटिश वैज्ञानिक के अनुसार 8700000 प्रजातियां हैं,लेकिन हमारे वेदों में 8400000  प्रजातियों का  जिक्र है।

जरा सोचिए हमारे ऋषि-मुनियों की गणना कितनी सटीक और सही होती थी।

भारतीय संस्कृति मानव प्रकृति और पर्यावरण के अटूट दूसरे संबंधों को लेकर चलती है।भारतीय उपनिषदों में जगत के कण-कण में ईश्वर के व्याप्तता को स्वीकार किया गया है।

भारत के संस्कृति में रीति रिवाज भाषाएं प्रथाएं और परंपराएं इसके एक दूसरे से परस्पर संबंधों में महान विविधताओं का अद्वितीय उदाहरण पेश करती हैं।

भिन्न-भिन्न धर्म के पालन,अलग तरह के भोजन, भिन्न-भिन्न भाषाएं हमारे यहां बोलते हैं,पर इनका स्वभाव एक होता है।

संस्कृति के बारे में पंडित मदन मोहन मालवीय जी का कहना है कि "भारतीय सभ्यता और संस्कृति की विशालता और उसकी महत्ता तो संपूर्ण मानव के साथ 'वसुधैव कुटुंबकम' की पवित्र भावना में निहित है।"

भारतीय संस्कृति में छोटे बच्चों को भगवान का रूप, अतिथि में भगवान, शरणागत की रक्षा, सलीका पूर्ण वस्त्र धारण, बुजुर्गों की सेवा, बहू - बेटियों को घर की इज्जत समझना,हमारी भारतीय संस्कृति को विशेष पहचान दिलाता है भारतीय संस्कृति महान और अक्षुण्ण है।
 
                                  :-•शालिनी•
                                    •स्वरचित•

मैं शालिनी मेरी यह रचना मौलिक व अप्रकाशित रचना है।
************************************************************
************************************************************
मंच को नमन🙏
कलम रथ 

विषय : भारतीय संस्कृति
विधा  :  आलेख
दिनांक  :  1/6/2021

      "भारतीय संस्कृति "

भारतीय संस्कृति परंपराओं की एक विलक्षण पहचान है ।
जिसे संक्षेप में लिखना एक चुनौती पूर्ण कार्य है ।

विरासत में मिली 
वैदिक , दैविक , धार्मिक ,
आध्यात्मिक , बौद्धिक , ज्योतिष , कला , संगीत ना जाने ऐसी कितनी ही संस्कृति का समावेश हमारी भारतीय संस्कृति का खजाना है ।

भारतीय संस्कृति का दर्शन
अपने आप मे सम्पूर्ण कलाओं
का मिला झुला संगम है ।

जिसे समझने व अध्यन के लिए सम्पूर्ण विश्व लालायित
रहता है ।

मानवता की मिसाल है ,
इंसानियत के मापदंडों पर खरी उतरती भारतीय संस्कृति
विश्व को वसुदेव कुटुम्बकम का पाठ पढ़ाती आई है ।

समस्त कार्य मानव की सेवा प्रकृति की पूजा , जीव जंतुओं की सुरक्षा को मध्यनजर रखते हुए । सब के कल्याण की सोच रखती है भारतीय संस्कृति ।

नारी को शक्ति , ईश्वर में भक्ति
बुजुर्गों व अतिथि को भगवान का दर्जा देने वाला ।
माता पिता , गुरु को पूजनीय , 
व परिवार को सर्वोपरि मान अपना सर्वस्व लुटाना यही भारतीय संस्कृति व संस्कारों का सुन्दर व अनुपम उदाहरण है ।

         कलम✍️
     अरुण ठाकर , ज़िन्दगी
     जयपुर , राजस्थान ।

स्वरचित : मौलिक
अप्रकाशित ।

मंच का आभार🙏
************************************************************
************************************************************
नमन कलम रथ परिवार
01 जून 2021
विषय-भारतीय संस्कृति
विधा:-लेख

  हमारे देश भारत की प्राचीन संस्कृति ही भारतीय संस्कृति कही जाती है। भारतीय संस्कृति हमारे ऋषि मुनियों की संस्कृति है। वेद पुराण उपनिषद ब्राह्मण ग्रन्थ मनु स्मृतियां रामायण महाभारत गीता हमारे पौराणिक शास्त्र है जो हमें भारतीय संस्कृति को सिखाते हैं।
   हमारा पहनावा कैसा हो,हमारा रंहन सहन कैसा हो,हम में कैसे संस्कार होना चाहिए, ये सब हम हमारी संस्कृति से सीखते हैं।
  मुनष्य में दो तरह की प्रवर्तियाँ  होती हैं। जिन व्यक्तियों में विजातीय प्रवर्तियाँ जैसे काम क्रोध लोभ मोह होती है तो किसी व्यक्ति में दया सहनशीलता करुणा परोपकार सहयोग सद्भाव व भाईचारे की भावना प्रेम की भावना होती है जो सत्पथ पर चलते है  यानि सजातीय वर्तियां होती है। 
   जिनमे विजातीय वृतियाँ होती है उन्हें आसुरिक स्वभाव वाले कहते हैं। जिनमे सजातीय वृतियां होती है वे दैवीय स्वभाव वाले देवता कहलाते हैं। 
  हमारी संस्कृति हमें दया करुणा प्रेम व सहयोग की भावना सिखाते हुए वसुधैव कुटुम्बकम की भावना रखना सिखाती है। सब विश्व के जन आपस मे भाई। सभी सुखी रहे। निरोग सभी भाई एक दूसरे के दुख में सहभागी बनें। मदद करे। विपदा काल मे सहायता करें।
  हमारी भारतीय संस्कृति हमे सूर्य चन्द्रमा तारे नक्षत्र पेड़ पौधे नदी जल पक्षी पहाड़ हर कण कण की पूजा करने की सीख देती है। हम पीपल वट तुलसी आंवले के वृक्ष की पूजा करते हैं। माँ गंगा यमुना सत्स्वती नर्मदा सरयू शिप्रा मैया की पूजा आरती करते हैं। भारत वह देश है जहां पत्थर पूजे जाते हैं। मूर्ति पूजा की जाती है। मूर्ति की स्थापना कर प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। हम जहाँ सिर झुकाते हैं वे ईश्वर हमारी सुनकर मन्नत पूरी करता है। हमारा देश आपसी भाईचारा कौमी एकता का देश है। हम हर त्योहार सभी धर्मों के साथ साथ उल्लास पूर्वक मनाते हैं।
विविधता में एकता हमारी भारतीय संस्कृति की विशेषता है। भारतीय संस्कृति में विज्ञान आध्यत्म कला कौशल आदि की सीख मिलती है।
धर्म अर्थ काम और मोक्ष ये चार पुरुषार्थ कर मनुष्य हमारी संस्कृति को अंगीकार करता है।
  अहिंसा जीव दया पशु कल्याण आदि भावनाएं भारतीय संस्कृति में निहित है।
    आज जब सारा विश्व वैश्विक महामारी से चिंतित है ऐसे समय भारतीय संस्कृति की बातें याद आने लगी है। सेवा कार्य,दया भाव,प्रेम से रहना,आदि।
   आज भारतीय संस्कृति के बताए योग प्राणायाम करने से असाध्य रोग बिना इलाज के सही हो रहे हैं। कोरोना जैसी महामारी में योग से लाभ मिल रहा। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ रही है। जो प्रतिदिन योग करते हैं वे स्वस्थ व निरोगी हैं।
  तीज त्योहार वाला हमारा देश है। व्रत उपवास का वैज्ञानिक महत्व है।यज्ञ हवन हमारी संस्कृति सिखाती है जिससे वातावरण साफ होता है। विज्ञान भी इस बात को मान चुकी है। कई असाध्य रोग हवन करने से दूर हो जाते हैं।
    हमारी भारतीय संस्कृति में अनेक महापुरुषों की शिक्षाओं को शामिल किया गया है। स्वामी दयानंद सरस्वती स्वामी विवेकानंद । रामकृष्ण परमहंस की जीवनियों को पढ़ने से जीवन निर्माण की कला सीखी जा सकती है ।
   भारतीय संस्कृति में शिक्षा व्यवस्था गुरुकुलों में होती थी। आश्रम में गुरुकुल होता जहाँ गुरु अपने शिष्यों को अस्त्र व शस्त्र के साथ ही शास्त्र की शिक्षा देते थे। गुरु की आज्ञा का पालन करना सभी शिष्यों को अनिवार्य था। गुरुकुल के कठोर नियम व अनुशासन में रहना पड़ता था।

स्वरचित,मौलिक,अप्रकाशित

डॉ. राजेश कुमार शर्मा पुरोहित
कवि,साहित्यकार 
भवानीमंडी
************************************************************
************************************************************
नमन कलम रथ परिवार 
# विषय-  भारतीय संस्कृति
# विधा-आलेख
रचना  क्रमांक 446
=======,=====,,,,====

भारतीय संस्कृति दुनिया की प्राचीनतम संस्कृति में प्रमुख है। हमारी संस्कृति व्यक्ति को जीवन जीने के बेहतर अवसर प्रदान करती है। भारतीय संस्कृति के मूल में धर्म अध्यात्म एवं जीवन दर्शन समाहित है। सांस्कृतिक आलोक में मानव जीवन को और अधिक प्रभावित , परिभाषित करने का नाम ही भारतीय संस्कृति है।
 हमारे मनीषियों विद्वानों ने पीढ़ियों का योगदान देकर भारतीय संस्कृति को स्थापित परिष्कृत एवं परिमार्जित किया है। सामाजिक समरसता ने भारतीय संस्कृति की महती भूमिका है ।पारिवारिक संस्था को भारतीय संस्कृति जीवन की प्रथम पाठशाला का दर्जा देती आई है। संयुक्त परिवार हमारी सामाजिक चेतना की मूल अवधारणा का प्रतिनिधित्व करते हैं। जहां परिवार के बहुत से बच्चे युवा और बुजुर्ग एक साथ एक छत के नीचे रहकर जीवन के सुख-दुख साझा निर्वहन कलते हैं। संयुक्त परिवार संरक्षण की भावना पर केंद्रित होते हैं ।
संस्कारों का संप्रेषण पीढ़ी दर पीढ़ी यहीं से  हस्तांतरित किया जाता है। हमारे धर्म ग्रंथ शास्त्र एवं जीवन सभी की मुख्य जानकारियां घर के बुजुर्गों के द्वारा नई पीढ़ी को हस्तांतरित की जाती है । साझा जीवन जीने की कला भारतीय संस्कृति का मूल आधार है। वर्तमान परिदृश्य में भारतीय संस्कृति बड़ी तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं। परिवार नामक संस्था धीरे-धीरे टूटकर एकल परिवार में परिवर्तित होती जा रही है।
 जीविका उपार्जन के साधन सीमित हो रहे हैं। परिवार के सदस्यों की संख्या बढ़ने से खेती का बंटवारा होता जा रहा है। जीविका की तलाश युवाओं को घर छोड़ने पर मजबूर कर रही है। आधुनिक शिक्षा पद्धति पाश्चात्य जीवन शैली पर आधारित है। आधुनिक युवा अंधानुकरण करने लगे हैं। इस कारण परिवार में रिश्तो के बीच दूरियां बढ़ने लगी है। विवाह विच्छेद पारिवारिक विवाद एवं अन्य सामाजिक संरचना में  विकृति नजर आने लगी है। 
फिर भी भारतीय संस्कृति मर्यादित आचरण करना सिखाती है। हमें हमारी संस्कृति को नहीं भूलना चाहिए। समय के अनुसार परिवर्तन भी जरूरी होता है। जो हमारे हित में ही है।  अनुचित को त्यागने में कोई आपत्ति नहीं है। कुल मिलाकर भारतीय संस्कृति पर हमें गर्व करना चाहिए !
====================
# रमेश चंद्र शर्मा
इंदौर 
स्वरचित मौलिक लेख
 रचना अप्रकाशित है
************************************************************
************************************************************
🌸सादर नमन मंच🌸
#कलमरथ परिवार
विषय - भारतीय संस्कृति
विधा - आलेख
दिनांक - 01/june/2021
शीर्षक - "भारतवर्ष की संस्कृति"

हमारे भारतवर्ष की संस्कृति, भारतीय संस्कृति सबसे प्राचीन वैदिक संस्कृति है। भारत में जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति की तरह मुझे भी अपनी भारतीय संस्कृति पर नाज है।
भारतीय संस्कृति में पेड़ पौधों से लेकर पशु पक्षी और यहां तक की निर्जीव पर्वत, नदियां,पाषाण सभी पूज्यनीय हैं।
हमारी भारतीय संस्कृति में भोजन को सिर्फ अन्न का पर्याय नहीं माना जाता है अपितु इसमें भी देवत्व की भाव निहित है। प्रथम रोटी गाय को तो अंतिम रोटी कुत्ते के लिए निकालना प्रत्येक गृहणी अपना कर्तव्य समझती हैं।
हमारी संस्कृति में गाय को और तुलसी को माता का दर्जा दिया गया है। पीपल, बरगद, केला, आंवला वृक्ष जिन्हें देवता तुल्य समझकर विभिन्न अवसरों पर इनकी पूजा की जाती है, यह प्राचीन काल से ही पशु पक्षियों के प्रति हमारे दायित्व एवं उनके संरक्षण का घोतक है। भारतीय संस्कृति में पंचतत्वों से लेकर वेद, पुराण, उपनिषद सभी हमारे जीवन के आधार है। माता - पिता,गुरुजन सभी देवतुल्य एवं वंदनीय है,इनका अपमान अक्षम्य है।
 हमारे भारतवर्ष में विभिन्न धर्मों को मानने वाले, भिन्न-भिन्न भाषा बोलने वाले, भिन्न परिवेश और आचार विचार के लोग निवास करते हैं लेकिन हमारा भारतवर्ष धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और यही हमारी संस्कृति का सबसे बड़ा परिचायक है अनेकता में एकता का रंग।
 "वसुधैव कुटुंबकम" और "सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया" की भावना भी इसी में निहित है। "अतिथि देवो भव" हमारी स्नेह अपनत्व की पराकाष्ठा ही है। यह भाव हमारे अनेक धार्मिक ग्रंथों मे देखने को मिलता है जिसमें समस्त पृथ्वी को ही एक परिवार माना गया है और सभी एक दूसरे के दुख में दुखी और एक दूसरे के सुख में सुख का अनुभव करते हैं।
आज हमारी भारतीय संस्कृति के मूल्यों को हमारे भारतवर्ष में ही नहीं अपितु विदेशों में भी मान्यता मिल रही है, परंतु कहीं ना कहीं हम अपने आचरण और क्रियाकलापों से अपनी भारतीय संस्कृति को आहत कर रहे हैं, प्रगति के लिए बदलाव आवश्यक है परंतु जब जड़े ही नहीं होंगी तो वृक्षों पर फल कैसे लग सकते हैं।
 भारतीय संस्कृति हमारी जन चेतना की जड़ हैं उसी से हमारी पहचान है। एक भारतवासी होने के कारण ही नहीं अपितु एक श्रेष्ठ संस्कृति के अनुगामी होने के कारण हमें अपनी भारतीय संस्कृति पर गर्व होना चाहिए।

स्वरचित अप्रकाशित आलेख✍️
डॉ रूपल श्रीवास्तव" शांभवी"
दतिया मध्य प्रदेश
************************************************************
************************************************************
नमन मंच
कमलरथ परिवार
महाप्रतियोगिता
दिनांक-01.06.21
दिन-मंगलवार
विषय-भारतीय संस्कृति
विधा-लेख

"भारतीय संस्कृति"


संस्कृति का अर्थ संस्कार या परिमार्जित से होता है।सभी देशों की अपनी अलग अलग संस्कृति होती है।वह उस देश की पहचान होती है। हमारे देश की संस्कृति की अपनी विशेषता और अलग पहचान है। जिसमें सभी संस्कृतियों को समाहित करने की शक्ति है। यहां की संस्कृति बहुत लचीली,और गौरवपूर्ण इतिहास से परिपूर्ण है। यहां की संस्कृति "सर्वे भवन्तु सुखिन सर्वे सन्तु निरामया"पर आधारित है।
   हमारे देश ने अनेक आक्रमण झेले। जिनमें मंगोलों, तुर्की, खिलजी,सैयद, लोदी,मुगलों, अंग्रेजों का प्रमुख रहा। इन सब के आक्रमण के साथ वहां की रीत रिवाज और संस्कृति भी साथ में आई। हमारे देश ने इन सब संस्कृतियों को अपने में समाहित कर लिया।
   हमारे देश की संस्कृति अनेकता में एकता लिए हुए है। यहां विभिन्न प्रकार के लोग भिन्न भिन्न धर्म,जाति, संप्रदाय,आदि में बंटे हुए हैं। लेकिन मोतियों की माला की भांति सभी एक साथ मिलकर रहते हैं। यही हमारी संस्कृति की विशेषता है। हिन्दू,मुस्लिम, सिख, ईसाई धर्म के लोग आपस में मिलकर काम करते हैं और रहते हैं।
हमारे देश की संस्कृति की एक और विशेषता यह है कि "अतिथि देवो भव"की भावना समाहित है। अतिथियों का बढ़ चढ़ कर स्वागत सत्कार किया जाता है।
हमारी संस्कृति मानवीयता पर आधारित है। संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है। अध्यात्म यहां का मूल मंत्र है जिसमें जीवन को चार आश्रमों में बांटा गया। ब्रम्हा चार्य, गृहस्थ,वाणप्रस्थ,और संन्यास सामिल है।
धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष की प्राप्ति को ही सर्वोपरि माना गया है।
हमारी संस्कृति विश्व की पुरातन संस्कृति में से एक अनोखी संस्कृति है।
आज के वर्तमान परिदृश्य में कुछ राजनीतिक पार्टियों जाति, धर्म की आग भड़का रहे हैं जो सर्वाथा अनुचित ।
हमारे देश की संस्कृति महान है और हमें अपने संस्कृति पर गर्व है

प्रेमा पटेल
स्वरचित मौलिक
अप्रकाशित
वाराणसी
************************************************************
************************************************************
नमन मंच कलम रथ परिवार 
महा प्रतियोगिता
 विषय- भारतीय संस्कृति
विधा -आलेख 
दिनांक -1-06- 2021 
दिन -मंगलवार
************
भारतीय संस्कृति-
भारतीय संस्कृति पर कुछ कहने से पहले हम यह जान लें कि संस्कृति क्या है संस्कृति मानव समाज का वह अभिन्न अंग है जो एक मानव समूह को अन्य मानव समूह के मध्य विशिष्ट पहचान दिलाता है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से संस्कृति समाज द्वारा सीखे हुए आचार व्यवहार की समग्रता का नाम है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होती है संस्कृत के द्वारा प्राप्त संस्कारों से ही मनुष्य पशु से परिष्कृत होकर सामाजिक प्राणी बनता है ।अब हम बात करते हैं भारतीय संस्कृति की ।भारतीय संस्कृति में हमें बहुत विभिन्नता दिखाई पड़ती है ।धर्म ,भाषा, खानपान ,परिधान ,भौगोलिक, परिस्थिति जन्य ,सामाजिक नियम ये सभी तत्व संस्कृति में समाहित होते हैं इन तत्वों के आधार पर भारतीय संस्कृति विभिन्न संस्कृतियों का मेल है। भारतीय संस्कृति की यह विशेषता है कि इसमें परस्पर विरोधी विचार समान रूप से महत्व पाते हैं। यहां यदि सन्यास की महत्ता है तो चार्वाक का उपभोक्तावादी दर्शन भी उतना ही प्रभावी है। मूर्ति पूजा का विधान है तो  निराकार ईश्वर की उपासना का पथ भी है। भारतीय संस्कृति को महान बनाने वाला तत्व उसमें निहित वैचारिक मूल्य हैं जो युगो युगो से भारत की पवित्र भूमि में अंकुरित और पल्लवित होकर संपूर्ण विश्व को प्रकाशित करते रहे हैं। अहिंसा और शांति के अमूल्य विचार भारत भूमि से नि:सृत होकर संपूर्ण विश्व में फैले हैं। उपनिषदों में सूत्र रूप में प्रस्फुटित विचार भारतीय संस्कृति को अमूल्य बनाते हैं' वसुधैव कुटुंबकम' 'अतिथि देवो भव ''असतो मा सद्गमय ''तमसो मा ज्योतिर्गमय 'जैसी सूक्तियां भारत के सांस्कृतिक मूल्य को प्रदर्शित करती हैं। भारतीय संस्कृति के इन गुणों ने ही संपूर्ण भारत को एकता के सूत्र में भी बांधा है भारतीय जन चेतना पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक आश्चर्यजनक ढंग से लगभग एक समय में एक समान विचार से संचालित होती है। यही कारण है कि भारतीय साहित्य का जब हम अध्ययन करते हैं तो लगभग एक ही समय में उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम सभी ओर समान विचारधारा का साहित्य दिखाई पड़ता है भक्ति की धारा दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवाहित होती है तो नाथ संप्रदाय और सिद्ध संप्रदाय के विचार सूत्र पंजाब से लेकर गुजरात व  बंगाल को प्रभावित कर लेते हैं । हिंदी का मध्यकालीन साहित्य तो भारतीय संस्कृति का अनुपम दर्शन प्रस्तुत करता है जिसमें संपूर्ण भारतीय संत परंपरा भारतीय जीवन आदर्शों को भारत की सामान्य जनता तक पहुंचाने का साधन बन जाती है।
प्राचीन भारतीय सभ्यता के समकालीन अनेक सभ्यताएं व उनकी संस्कृति लुप्त हो चुकी है किंतु यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है जो भारत की हजार वर्ष पुरानी सनातन परंपरा को आज भी जीवंत बनाए हुए हैं।। गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने इसीलिए भारतीय समाज को एक महासागर की तरह देखा है जिसमें अनेक संस्कृति की नदियां समाहित हैं और यह सब मिलकर भारतीय संस्कृति को एक महान संस्कृति बनाती हैं। भारतीय संस्कृति की अक्षुण्णधारा को नमन।" कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी दुश्मन रहा है सदियों दौरे जमां हमारा"।

मौलिक अप्रकाशित 
डॉक्टर नीलम तिवारी राजनांदगांव छत्तीसगढ़
मैं डॉक्टर नीलम तिवारी घोषणा करती हूं कि या मेरी मौलिक अप्रकाशित रचना है।
************************************************************
************************************************************

Bookmark Us

Delicious Facebook Favorites More Stumbleupon Twitter

Search