Tuesday, May 25, 2021

May 25, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
ज्ञान भंडारी!
कलमरथ दैनिक आयोजन!
दिनाँक --25/05/2021.
विषय --खुशबू!
विधा --पद्य!

खुशबू!
खुश्बुओ की कोई किताब नहीं होती,
वो तो बसा करती है दिल के चमन में,
मधुबन खुशबू द्वार खोलता, सिखलाता है जीवन आधार,
उपहारों का संसार है रचता,
देता है अद्भुत उपहार,
जिंदगी के धूप - छाँव में,
आशा निराशा के घेरे में,
नव जीवन रोशन करता,
करता है पुलकित मन,

नेह से नेह का द्वार खुश्बुओ का दरबार लगाता,
बसा देता विरहनी का संसार,
स्व जनों को मोतियन सा चमकाता,
खुशबू फैलाता हर घर द्वार,

फूलों को आधार बना लो,
संसार खुशबू महकायेगा,
कांटो से भी प्यार करो तुम,
अश्कों की क़ीमत समझायेगा!

स्व रचित व मौलिक,
ज्ञान भंडारी!
मुंबई!
May 25, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन मंच कलम रथ
विषय   खुशबू
विधा   काव्य
25 मई 2021,मंगलवार

कौन नहीं चाहता है खुशबू
खुशबू का हर नर दीवाना।
उपवन कुसुम खुशबू देते हैं
सबकी चाहत खुशबू पाना।

यश खुशबू , देती नर शांति
ज्ञान की खुशबू नित्य महके।
जीवन जीना महान कला है
कर भलाई मूर्ख क्यों बहके?

खुशबू कभी दिखाई न देवे
खुशबू को अनुभव करते हैं।
यश कीर्ति, खुशबू फैलाकर
पर हित पथ सुसंत चलते हैं।

प्यार की खुशबू अति सुहानी
खुशबू नेह जीवन का आधार।
खुशबू स्नेह,  हृदय में पलता
खुशबू प्रेम, स्वप्न करे साकार।

बिन खुशबू के जीवन कुछ न
खशबू प्राणवायु में संचित हो।
नर जीवन भाग्यशाली मिलता
कोई खुशबू से नहीं वंचित हो।

स्वरचित, मौलिक
गोविंद प्रसाद गौतम 
कोटा,राजस्थान।
May 25, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन मंच
विषय-खुशबू

खुशबू कर्म की तेरी हो ऐसी
कि हर जहाँ सुवासित रहे।
नेकियों का सिलसिला चले
कि तन मन सदा सुरभित रहे।

व्यवहार सदा बने सबका ऐसा
कि मन सदा आह्लादित रहे।
नही भरम रहे मन में कोई
कि नेकनीयती सदा ही बनी रहे।

खुशबू पुष्प सा सदा सुगंधित रहे,
कि घर आँगन सुशोभित रहे।
नाम हो ऐसा तेरा जग में ऐसा
कि हर कोई अचंभित रहे।

खुशबू सदा दूसरों के लिए हो,
कि दुख दर्द उनका सदा ही मिटे।
प्यार की खुशबू से जग का हर कोना,
हमेशा ही सुरभित सदा ही रहे।

मेरी रचना अप्रकाशित और मौलिक है

रूचिका राय
May 25, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमनमंच
#कलमरथ_परिवार 
दिनांक-25.05.2021
विषय-खुशबू
विधा-कविता


माटी की खुशबू
*************
याद आता है माटी का वो घर 
जिसमें हमारा बचपन बीता।
मोटी मोटी दीवारों वाला
वो खपरैल का घर
उसी माटी वाले घर में
हम पले,बढ़े,खेले कूदे और आज
शहर वासी बन शान बघारते हैं।
उन दिनों बिजली गाँवो से दूर थी
फिर भी हम खुश थे
उस माटी के घर में,
अपने भरे पूरे परिवार के साथ।
बड़ा सा घर,बड़ा सा आंगन
बाहरी हिस्से में
आज का बरामदा कहिए
होता था दालान।
डर भी लगता था
साँप बिच्छू का भय
हमेशा बना रहता था।
वारिश का कष्ट दायी समय भी
अपने घर में
सूकून का अहसास कराता था।
आज तो कंक्रीटों का जाल है
तब वो माटी का घर
कितना सूकून देता था,
नई पीढ़ी उस सूकून से
अपनेपन का अहसास 
कहाँ कर पायेगी,
पक्के मकान भी
खुशी का वो अहसास
कभी नहीं दे पायेगी।
माटी के घर की खुशबू
अब कहाँ मिल पायेगी?
माटी के घर की कहानी
अब इतिहास में ही रह जायेगी।

✍ सुधीर श्रीवास्तव
      गोण्डा(उ.प्र.)
     8115285921
©मौलिक, स्वरचित,अप्रकाशित

May 25, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in
http://kalamrath.blogspot.com/2021/05/2021_25.html

Monday, May 24, 2021

May 24, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in ,
नमन मंच
#कलमरथ परिवार दैनिक आयोजन 2021
#विषय- कसम
#विधा -कहानी 
#दिनांक -24/5/2021
#दिन -सोमवार

कॉलेज का आखरी दिन, मैं अपनी सहेलियों के साथ बैठी उनकी डायरियों में संदेश लिख रही थी।एक मित्र ने समोसा पार्टी दी थी, सब खुश भी थे एक नए जीवन मे प्रवेश करने का समय, साथ ही दुखी भी एक दूसरे से बिछड़ने के कारण।मैंने भी सबके लिए कविता लिखी थी, सबको सुनाई, कुछ लोग आत्मविभोर भी हुए, कुछ सिर्फ सुन कर मनोरंजन किए। सबसे मिल कर जब जाने लगी  ऑटो स्टैंड की तरफ ,घर जाने के लिए,अचानक किसी ने मुझे आवाज लगाई। मैं पलटकर देखी। मेरी कक्षा का एक लड़का,जो मेरे मित्रों वाले ग्रुप का सदस्य नहीं था, पीछे खड़ा था।" कैसे हो राज" मैंने पूँछा।
" चलोगी मेरे  साथ गन्ना रस पीने, सामने ही ठेला है" उसने पूँछा।
राज था तो बहुत कंजूस, आज तक किसी को कुछ खिलाया पिलाया नहीं था,इसीलिए उसको किसी भी ग्रुप में शामिल नहीं किया गया था। लंबा, गोरा, माथे पर लटकते बाल, छोटी छोटी नींद में बोझिल सी आकर्षक आँखें, और प्यारी सी मुस्कान।सभी लड़कियाँ उसकी बहुत बातें करती थीं।कभी कभार आकर मुझसे हाल चाल पूँछ लिया करता था।हमने गन्ना रस पिया फिर बातें करने लगे। उसने पूछा अब आगे क्या करने का इरादा है। मैंने कहा शादी।"ऐसे ही किसी से भी कर लोगी बिना जाने समझे"।सब ऐसा ही करते हैं, माता पिता तो देखते ही हैं न,मैंने उत्तर दिया। पर हीरे की परख सिर्फ जौहरी ही कर सकता है, ये बात हमेशा याद रखना।कभी खुद को हीरे से कम नहीं समझना।" जिंदगी में हमेशा खुश रहना और अपनी ये मुस्कुराहट हमेशा संभाल कर रखना, ये वादा कर मुझसे "। मैंने हाँ कहा और घर चली गयी ।उसकी ये बात उस समय तो उतनी समझ में नहीं आई, वो ऐसा क्यों कह रहा था लेकिन शादी के बाद जब भी कभी खुद को अकेला या दुःखी पाया, उसका मुस्कुराता चेहरा और वो बातें हमेशा याद आती और एक नई प्रेरणा और शक्ति दे जाती। आज वर्षों बीत गए, जीवन में कई उतार चढ़ाव आए पर जब जब बिखरने लगी हमेशा वो चेहरा और वो कसम मुझें याद आती रही। लोग कभी न भूलने की कसम दिलाते हैं पर उसकी ये अनोखी कसम हमेशा उसके निष्छल मन और असीमित प्रेम को दर्शाती रही।और मैं खुद को हीरा समझ अपने आप को निखारने की हमेशा ही कोशिश करती हूँ और हमेशा मुस्कुराती हूँ उस कसम का मान रखते हुए।

नीलम द्विवेदी
रायपुर, छत्तीसगढ़।
स्वरचित, मौलिक।
May 24, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,

#कलम रथ परिवार साहित्य मंच 
#दिनांक : 24 मई 2021.
#दिन : सोमवार
#विषय : कसम
#विधा : कहानी
शीर्षक : सैनिक की कसम

यह कहानी सत्य घटना पर आधारित है पात्र और स्थान बदले हैं| देवेश आज छुट्टी पे घर के लिए निकला था| बहुत दिनों बाद छुट्टी मंजूर हुई थी| ट्रेन के एसी 2 टायर में बैठकर वो अपने गाँव की ओर जम्मू से चला| लंबी यात्रा थी, और बहुत सी यादें| उसे याद आ रही थी वो खाई हुई कसमें| पहले देश, फिर जनता, उसके बाद साथी सैनिक, परिवार और अंत में ख़ुद की रक्षा| वैसे तो देवेश छुट्टी पे जा रहा था किन्तु जो सेना में नियुक्ति के समय कसम ली थी उसके अनुसार एक सैनिक हमेशा ड्यूटी पे तत्पर रहता है| यात्रा का एक पढ़ाव बिहार झारखंड की सीमा पे पड़ता था जहां हमेशा कानून व्यवस्था के क्षेत्र को लेकर विवाद रहता है जिसका फायदा असामाजिक तत्व उठाते थे| सभी यात्री सोने की तैयारी करने लगे देवेश भी फ्रेश होने सीट नंबर 46 की ओर के शौचालय की ओर गया| ऐसा लगा कि किसी स्टेशन पर ट्रेन रुकी और एकदम से चल पड़ी| अचानक कोच में हल्ला मच गया देवेश ने बाहर आना चाहा तो पाया कि किसी ने छड़ लगा के दरवाजा लॉक कर दिया| अपनी कमांडो ट्रेनिंग को याद करके देवेश ने छड़ को मोड़कर बाहर झाँका| कोच में उसे लगा कि करीब 8-10 लोग घुस आए हैं और यात्रियों को लूट रहे हैं और महिलाओं के साथ बदतमीजी भी कर रहे हैं| यह देख देवेश से रहा ना गया| उसने साइड बर्थ में बैठे यात्री को सरकने का इशारा किया और धीरे से ऊपर चढ़ के अपनी और लुटेरों की स्थिति का जायज़ा लिया| एक योजना के तहत उसने प्लान को अंजाम देना शुरू किया| और एक एक करके लुटेरों की कोशिशों को नाकाम करते हुये आगे बढ़ा| दूसरी तरफ लुटेरों का सरदार एक लड़की को अगवा करने की कोशिश कर रहा था और सभी को अंजाम भुगतने की धमकी| अचानक लुटेरों के सरदार को कुछ भान हुआ कि उसके आदमी कोई दिख नहीं रहे हैं| धमकी देते हुए उसने आवाज़ लगाई कि जो भी ऐसी कोशिश कर रहा है सामने आ जाए अन्यथा लड़की को जान से मार देगा| देवेश अब सामने आ गया और कहा कि लड़की को छोड़ दे नहीं तो वो ख़ुद मारा जाएगा| इतना सुनते ही सरदार ने लड़की को एक तरफ धक्का दिया और देवेश पे दराँती से वार किया, एकदम से हुये वार से देवेश को दराँती छूते हुये निकली दोनों के बीच कुछ देर छोटी जंग चली चूंकि जगह सीमित थी और सहयात्री थे तो देवेश संभल के वार कर रहा था| इस कारण उसे कई चोटें आ गयी किन्तु अंत में देवेश ने उस सरदार को भी कब्जे में लेकर बेल्ट से बांध दिया अगले स्टेशन पे जब गाड़ी रुकी तो जीआरपी के पास एफआईआर लिखा कर लुटेरों को पुलिस के हवाले कर दिया| प्राथमिक चिकित्सा के बाद देवेश और सहयात्री अपनी यात्रा पे चल दिये| सभी सहयात्रियों और स्टाफ ने देवेश को धन्यवाद दिया| देवेश बोला कि एक सैनिक कभी भी छुट्टी पर नहीं होता क्योंकि उसने देश समाज और परिवार की सुरक्षा और संरक्षा की कसम ली होती है|

रचनाकार का नाम- संजीव कुमार भटनागर
मुंबई, महाराष्ट्र.
मेरी यह रचना मौलिक व अप्रकाशित है।

May 24, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
#नमन मंच
#कमल रथ परिवार
#विधा कहानी
#विषय कसम
#दैनिक आयोजन 2021

कस्मे वादे प्यार वफ़ा, फिर तोड़ना, और छोड़ना आगे यही सिलसिला चलता है कसमें तोड़ दी जाती हैं वादे विफलता की ओर अग्रसर होते है। वफ़ा भूल जाते है, प्यार के नगमे भूल जाते है, वो तराने याद नहीं आते।।

हमारे गांव में एक लड़का और लड़की दोनों बेइंतहा मोहब्बत करते थे। दोनों एक ही जाति के थे दोनों का प्यार परवान चढ़ रहा था आसपड़ोस में सभी को मालूम था।

 ये बात धीरे धीरे माता पिता तक पहुंच गई। मातापिता ने शादी के लिए एक दूसरे से बात की। पर उनके पिताजी ने शादी के लिए दहेज की मांग की। पर लड़की के पिता गरीब थे उन्होंने बहुत समझाया पर उनके समझ में नहीं आया।

 लड़का लड़की दोनों से बात की। दोनों से कहा, कसमें वादे प्यार वफ़ा सब निभाओ पर शादी कर लो। और लड़का भी सभी वादों को तोड पिता के साथ हो लिया और ये शादी टूट गई। दोनों हमेशा हमेशा अलग हो गए। कसमें वादे प्यार वफ़ा सब ख़तम हो गए।

कैलाश चंद साहू
बूंदी राजस्थान
May 24, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन मंच
कमल रथ परिवार
दिनांक 24-5-2021
विषय कसम
विषय कहानी

    कुछ समय पहले की बात है रामदयाल के घर में परिवारिक क्लेश के कारण वह गांव में रहना नहीं चाहता था। और उसने अपने पत्नी के साथ कसम खाई थी। हम थोड़ा थोड़ा धन बचा कर कई और मकान ले लेंगे। और इस मकान को यहां किसी को किराया पर दे देंगे।
   भगवान यह मेरी कसम प्रतिज्ञा को पूरा करना वह बहुत परेशान रहा । वह थोड़ा थोड़ा धन बचाता रहा और और जब रूपया पैसा थोड़ा जमा हो गया ।शहर में जगह-जगह मकान देखने जाता रहा 
    ।इस प्रकार से उसने अपनी हर छाएं दबाकर इच्छा दवा कर पाई-पाई जोड़कर अपने लिए शहर में मकान लिया। और खुश होकर अपनी पत्नी बच्चों के साथ में गांव छोड़ कर शहर में अपनी मकान पर आ गए ।जहां उसके बच्चों की शिक्षा के लिए परिपूर्ण साधन उपलब्ध थे। और वह अपने घर में पूर्ण रुप से स्वतंत्रता से रहने लगा ।बच्चे पत्नी सभी बड़ी खुश से और उसकी कसम भी संपूर्ण रूप से पूरी हो गई ।
   इस प्रकार से रामदयाल अपनी जीवन में कठिनाइयों को झेलकर काफी खुश था। और वह अपनी पत्नी बच्चों के साथ पहले से अब हंसी खुशी रहने लगा ।
   इस प्रकार से उसकी पत्नी ने भी अपनी कसम को पूरा करने में पति का पूरा सहयोग दिया। और अपने परिवार के साथ हंसी खुशी समय व्यतीत करने लगे गांव का मकान भी किराए पर चढ़ गया। और वह सभी ओर से खुशहो गया।           रामदयाल ने बहुत परेशानियों का सामना किया था। 
      रामदयाल अब बहुत खुश था अब मेरा बुढ़ापा तो अच्छी तरह कट जाएगा। इस प्रकार बच्चे पत्नी भी बाकी समय खुश हंसी खुशी से बिताया।
शिक्षा
हम मेहनत के बाद पर अपने सभी कसम प्रतिज्ञा को सदैव पूरा कर सकते हैं हमें इमानदारी से अपनी कमाई में से सदैव कुछ धन बचाना चाहिए।

स्वरचित मौलिक
संगीता चमोली
देहरादून उत्तराखंड
May 24, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन क़लम रथ परिवार
दिनांक-24/05/21
विषय-कसम
विधा -कहानी
सुहाना और रहीम दोनों एक-दूसरे से बेइंतहा मुहब्बत करते थे मगर गांव वालों को उनकी मुहब्बत रास न आई ..
इसलिए गांव वालों ने सरपंच को बुलाकर पंचायत बैठाया दोनों के मां बाप से उनकी रजामंदी जानी गई और पंचायत में सलमा जो कबीर की दोस्त और सुहाना की सहेली थी उसने पंचायत में यह कसम खा लिया कि कबीर और सुहाना आपस में प्यार करते हैं उनको दोनों को सादी करनी चाहिए और सुहाना और रहीम की नहीं ..
पंचायत में इस बात पर बहस छिड़ गई कि जो कसम सलमा ने खाई वह झूठी है या सच्ची ..
अगर सलमा झूठ बोल रही है तो क्यूं .. क्या सलमा सुहाना और कबीर से जलती थी और फिर उसने अपनी मां की झूठी कसम क्यूं खाई..
यह जरूरी नहीं जो कुछ गीता पर हाथ रखकर अदालत में बोला जाए वह सच ही हो ..आज के युग में सच बोलने के लिए बहुत बड़ा जिगर होना चाहिए.. कबीर ने रहीम का हाथ पकड़ते हुए कहा।
क्यों तुम इतने बड़े समझदार कब से होगये कबीर की सच क्या है झूठ क्या है तुम उसे पहचान सको जब अदालत का जज नहीं फैसला कर पाता कि असली सच क्या है बस उसे यह लगता है कि गीता या कुरान पर हाथ रखकर कसम खाने वाला हर इंसान सच ही बोलता होगा बस वही सच मान लेता है ..रहीम ने मुस्कुराते हुए कहा।
कसम तो कोई झूठी क्यूं खाएगा दद्दा..वह भी गीता और कुरान की.. सुन्दर ने कबीर से पूछा ।
यह तो आज कल धंधा सा हो गया है सुन्दर ...यहां कचेहरी में लोग पैसों की लालच में गीता कुरान क्या अपनी औलाद तक की झूठी कसमें खा जाते हैं और उन्हें या उनके परिवार का इसी से भरण पोषण भी चलता है..रहीम ने सुंदर को समझाते हुए कहा ।
भैय्या कसम झूठी है या सच्ची वह तो खाने वाला ही समझ सकता है या फिर ऊपरवाला.. खुद तो मोह माया की लालच में फंसा होता है और ऊपर वाला अपने समय पर ही उसका फैसला करता है.. कबीर ने मुस्कुराते हुए बोला।
मगर यहां बात कुछ दूसरी है कबीर भाई ..न तो यह अदालत है न कोई यहां पर पुलिस की कोई जबरदस्ती फिर सलमा ने क्यों अपनी मां की कसम खाई कि रहीम और सुहाना एक दूसरे को प्यार करते है.. सुन्दर ने रहीम की तरफ इशारा करते हुए कहा।
सलमा ने झूठी कसम इस लिए खाई कि वह कबीर से प्यार करतीं थीं और कबीर उससे नहीं किसी और से प्यार करता था इस जलन में उसने झूठी कसम खा कर रहीम और कबीर में नफरत और दुश्मनी पैदा करना चाहतीं थीं जो कि आपस मे सच्चे मित्र थे ..
कसम तो कसम होती है पर सच्चाई का पता कसम से नहीं खुद की मंजूरी से होती है और हमने कबूल कर लिया कि मैं सुहाना से प्यार करता हूं और यह सत्य है..रहीम ने सभी से हाथ जोड़कर कहा और सुहाना को गले लगा लिया ..
राजन मिश्र 
स्वरचित
अंकुर इंक्लेव
करावलनगर दिल्ली 94
May 24, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन कलम रथ 
24/5/2021
विषय- क़सम 
लघु कथा 
शीर्षक- सबक़

रमन को पार्टियों में जाना बहुत पसंद था । हर जगह प्रभा यानि मुझे लेकर जाता था । जबकि मुझे पार्टियों में जाना एकदम अच्छा नहीं लगता । पर पत्नी होने के कारण जाना पड़ता था । उसे मना नहीं कर पाती ।एक दिन किसी दोस्त की जन्मदिन की पार्टी थी मुझे जाने को कहा पर मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं थी सो मैंने मना कर दिया । पर रमन नहीं माना । बोला . ..जल्दी से तैयार हो जाओ ।
प्रभा बहुत सुंदर थी और जब तैयार होकर निकलती तो और भी खुबसूरत लगती । रमन को बहुत गर्व महसूस होता ये भी कारण था कि वह हर जगह उसे साथ लेकर जाता था ।
वो जब पार्टी में पहुँचे तो थोड़ी देर हो गई थी । सबने कारण पूछा । रमन बोला , प्रभा की तबियत कुछ ठीक नहीं थी। तब अचानक रमन का एक दोस्त विकास आया और प्रभा की बाँह पकड़ कर बोला , चलो भाभी आप आराम से बैठ जाओ । मैं आपके लिए कुछ पीने को लाता हूँ । आपको अच्छा लगेगा ।
प्रभा को अच्छा नहीं लगा पर सब कहने लगे आप बैठ जायें ।प्रभा जाकर बैठ गई । विकास
ठंडा लेकर आया वो पीने लगी उसे स्वाद कुछ अच्छा नहीं लगा।पर लगा कि शायद तबियत की वजह से लग रहा है ।पीने के कुछ देर बाद ही उसका सिर घूमने लगा।वो रमन को पुकारती है पर वो दोस्तों के बीच मस्त रहता है नहीं सुनता । विकास बोला ..क्या बात है भाभी कुछ परेशानी है । कहकर वह हाथ को पकड़ने की चेष्टा करने लगा ।प्रभा उसकी नियत भाँप गई कि उसका इरादा ठीक नहीं । ज़रूर ठंडा में उसने कुछ अल्कोहल मिला दिया है ।वह तुरंत उठी और भागती सी रमन के पास पहुँची . घर चलो अभी।
पर क्यों ? क्या हुआ पूछा रमन ने ।
पहले घर चलो ।
विकास भी वहाँ पहुँच गया. बोला ..भाभी तो यूँ ही घबरा रही है ।
प्रभा यहाँ कोई तमाशा करना नहीं चाहती थी।
रमन का हाथ पकड़ खींचती बाहर की ओर चल दी । उसके पैर डगमगा रहे थे । रमन को लगा तबियत
ज़्यादा बिगड़ गई है ।
घर आने के बाद प्रभा ने सारी बातें बताईं । रमन ने उसे दवा वग़ैरह दी ।रमन को सुनकर खून खौल रहा था पर प्रभा ने उसे शांत किया । रमन को सीख मिल गई थी उसने क़सम ख़ाली फिर कभी पार्टियों में जाने की ज़िद नहीं करेगा ।फिर उसने कभी वैसी पार्टियाँ में जाने की ज़िद नहीं की । पारिवारिक  आयोजन में ज़रूर जाता ।विकास से बातचीत बंद कर दी । उसने माफ़ी माँगी ।इस तरह वक्त ने बहुत बड़ा सबक़ दिया रमन को ।और ये क़सम उसकी ज़िंदगी का लक्ष्य बन गयी और खुशहाल जीवन का आधार ।
स्वरचित 
चंदा प्रहलादका
May 24, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन मंच 🙏
#विघा: #गघ(कहानी)
#शीर्षक : #तोषी_की_कसम
#विषय: #कसम
क़लमरथ दैनिक आयोजन
दिनांक:24.5.2021

#तोषी_की_कसम

तन्मय का तो आज रो रो कर बुरा हाल था। रोते-रोते भी बड़बड़ाए जा रहा था- "काश !! .....  मैंने कसम तोड़ दी होती। काश !! ...  मैंने कसम तोड़ दी होती"। 
मां ने तन्मय को झंनझोडते हुए चिंतित स्वर में पूछा- "क्या बोले जा रहा है तन्मय ? कौन सी कसम की बात कर रहा है ? क्या बात है, मुझे अभी बता किस कसम की बात कर रहा है "? तन्मय अपने आप को रोक नहीं पाया सुबकते हुए बोला "मां, आपको याद है। पिछले महीने मैं तोषी के ससुराल बिना उसे बताए पहूंच गया था। उस दिन मैंने वहां देखा तोषी के ससुराल वाले उसके साथ बहुत बुरा बर्ताव कर रहे थे। वो उससे दहेज लाने की मांग कर प्रताड़ित भी कर रहे थे"। "हैं !! ..... तू ये क्या बोल रहा है तन्मय ? होश में तो है ? मां चिंतित, परेशान हो कुछ सोचते हुए बोली- "लेकिन तोषी ने तो कभी मुझसे या अपने पापा से इस बारे में कोई जिक्र नहीं किया।" "हां मां, तोषी ने मुझे भी इस बारे में आप दोनों से कुछ ना बताने की कसम दी थी। तोषी हमें परेशान नहीं करना चाहती थी और ना ही अपने ससुराल वालों का घिनौना चेहरा हम सबके सामने लाना चाहती थी। इस कारण बस खुद ही सारे दुख अकेले ही सह रही थी। देखो अपनी कसम देकर वह हम सब को छोड़ कर चली गई। काश !! मैंने उसकी दी हुई कसम तोड़दी होती तो शायद तोषी आज हमारे बीच होती।" तन्मय की बात सुनकर तो मां-पिताजी पर तो दुखों का पहाड़ ही टूट गया। मां-पिताजी दोनों निष्प्राण से दीवार का सहारा लिए जैसे तैसे खड़े थे। तन्मय ने दोनों को संभाला। उन्हें आश्वस्त किया की वो तोषी के ससुराल वालों पर कानूनी कार्यवाही करके उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दिलवाएगा। ताकि फिर किसी तोषी को अपने माता-पिता से अपने परेशानी छुपाने या ससुराल में होने वाले दुर्व्यवहार को छुपाने के लिए किसी कसम का सहारा ना लेना पड़े। और ना ही अपने प्राणों की आहुति देकर अपने प्रियजनों को बिलखता हुआ छोड़कर जाने पर मजबूर होना पड़े।

#स्वरचित:#डॉ_शिखा_नागर
#गाजियाबाद (उ.प्र)
24 5.2021

#मैं_डाॅ_शिखा_नागर_गाजियाबाद_उप्र_से_मेरी_यह_रचना_मौलिक_व_अप्रकाशित_है।
May 24, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
#कलम रथ परिवार मंच को नमन
 # दैनिक आयोजन 
# विषय कसम 
#विधा कहानी 
#दिनांक 24 मई 2021
# दिन सोमवार
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                  रमेश एक दिन पड़ोस में अपने खानदानी ताऊ रामलाल के यहां बेठा था वहां उनके छोटे भाई बनवारी लाल जी जो उस जमाने के अच्छे वकील थे और लखनऊ में रहते थे आए हुए थे रमेश ने उनके पैर छुए उन्होंने रमेश से पूछा तुम किस क्लास में पढ़ते हो रमेश ने कहा मैं कक्षा दस में पढ़ता हूं बोले तुम दसवीं क्लास में आ गए बहुत पढ़ाई कर ली फिर बोले अब तुम्हारा क्या इरादा है रमेश ने कहा मैं पढ़ लिखकर अच्छा वकील या डॉक्टर बनना चाहता हूं , मुस्कुराते हुए बोले अपने बाप दादा से ज्यादा पढ गए  जिसके घर में कोई न पढ़ा हो इतना पढ़ लिया बहुत है।
                       यह बात रमेश को-बहुत चुभ गई उसने उसी समय उनके सामने कसम ली कि 10 साल के भीतर मैं आपको आपके समकक्ष खड़ा दिखाऊंगा व रमेश ने जी जान से मेहनत कर  अपने को एक सफल अधिवक्ता के रूप में स्थापित किया। व बनवारी लाल के सामने उनको यह दिखा दिया की जो बात लग जाती है वह हर मंजिल आसान कर देती है  इस कहानी से हमें सीख मिलती है तीखे व्यंग बढ़-चढ़कर नहीं बोलने चाहिए जो आदमी को ठेस पहुंचाए रमेश की कसम ने रमेश को प्रेरणा दी जिसके फलस्वरूप वह एक सफल अधिवक्ता साबित हुआ।

 स्वरचित  अप्रकाशित मौलिक  कहानी।
 नृपेन्द्र कुमार चतुर्वेदी एडवोकेट।
 प्रयागराज उत्तर प्रदेश।
May 24, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन मंच
#कलम_रथ _परिवार दैनिक आयोजन 2021
#विषय: कसम
#विधा: कहानी
#दिनाँक:24/5/2021
#दिन: सोमवार

सुहानी ने काजल लगी आंखों को आईने में एक बार फिर संवारा। जिंदगी के आइने में साहिल दिखा,अपने बाहों में भरते हुए।वह  उसकी आंखों में आंखें डालते अक्सर उन आंखों की गहराइयों में डूब जाने की बात करता।तब उम्र ही कितनी थी उसकी,अठारह भी पूरे नहीं हुए थे। छुईमुई सी उसकी बाँहों में जा सिमटती थी |
 उसकी कसकर बांधी पोनीटेल को खोल कर कहता,खुले बालों में कयामत लगती हो,बाल बांधा मत करो।सुहानी के गाल सुर्ख हो जाते कान की लवें गर्म हो जातीं।वह उसे बेतहाशा प्यार करता।
 कुछ ही मुलाकातों के बाद उसने सुहानी को घर से कीमती सामान लेकर भागने के लिए मना लिया।
 "देख सुहानी,तेरे मां -बाप तेरी शादी मुझसे कभी न होने देंगे।हम भाग कर शादी कर लेंगे।तू कुछ गहने पैसे ले आना,देख मेरी बात पूरी सुन ,मुझे गलत मत समझना।हम कुछ दिन बाद वापिस आकर तेरे मां -पापा को मना लेंगे।उनसे माफी मांग लेंगे।सब पहले जैसा हो जाएगा।उपर वाले की कसम!कसम पर तो यकीन है ना?"
 'मुझे तो तुझ पर रब से भी ज्यादा यकीन है। कसम मेरे सिर की!"
 सुहानी को रात प्लेटफार्म पर खाली हाथ देख साहिल के मंसूबों पर पानी फिर गया था।कहां उसने सोचा था..मगर वह हार मान लेने वालों में नहीं था...और
 उसने तो पूरी शिद्दत से समर्पण किया था,कितनी मुहब्बत की थी साहिल से!
अतीत की उन कड़वी यादों में गुम आज जब वह फिर आईने के सामने बैठी तो एक-एक बात रील की तरह उसकी आंखों के आगे चलने लगी। पीछा नहीं छोड़ता उसका अतीत!
उसने बालों को कसा, जूडे में बाँधकर गजरा लपेट लिया। होंठों को सस्ती लाली से सुर्ख किया।पाउडर की एक और परत चेहरे पर थपथपाई।आंखों में आंसू झिलमिलाए, कहीं काजल फैल न जाए।मौसी दो बार चिल्ला चुकी है कि ग्राहक आ चुका है।

गीता परिहार
अयोध्या
May 24, 2021 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन मंच
विषय -कसम

राधा रेखा और नेहा तीनो पक्की सहेलियां थीं, एक दूसरे के संग खेलना कूदना,पढ़ना,लिखना,बैठना उठना।
इन तीनो को एक साथ कही भी देखा जा सकता था,चाहे स्कूल हो या खेल का मैदान या फिर घर।
बस सोने के लिए ही तीनों अपने अपने घर जाती थी और अलग अलग रहती थी।
इनके माँ बाप को भी यह दोस्ती सी पसंद थी,क्योकि तीनो ही पढ़ने लिखने में अव्वल ,खेल कूद में तेज,अन्य कार्यों में होशियार और विनम्र थी।
पर एक दिन ऐसा हुआ कि इन तीनों की दोस्ती ही संकट में आ गयी।
राधा रेखा दोनो स्कूल गयी थी,नेहा बीमारी के कारण स्कूल नही जा पाई थी।स्कूल में राधा रेखा को एक प्रतियोगिता का पता चला,दोनो ने उसमें भाग लिया और एक कसम खाया की नेहा को नही बताएंगे।
मगर नेहा को किसी दूसरे से उस प्रतियोगिता का पता चल गया।उसने राधा और रेखा से उसके बारे में पूछा पर दोस्ती की कसम खाने की वजह से उसने नेहा को इसके बारे में नही बताया।
और इधर नेहा को ऐसा लग रहा था कि दोनों ने उससे धोखा किया है।
इस प्रकार बेवजह के कसम के मान रखने के चक्कर में उनकी दोस्ती टूट गयी।
जब राधा और रेखा से किसी ने पूछा कि वह नेहा से इस प्रतियोगिता के बारे में क्यों नही बताई तो उन्होंने कहा कि नेहा शारीरिक रूप से विकलांग हैं,हम उसे बता कर अफसोस में नही डालना चाहते थे या दुखित नही करना चाहते थे कि वह इस प्रतियोगिता में भाग नही ले सकती।
इस प्रकार दोस्त का मान रखने के लिए उन दोनों ने कसम को निभाया।
जब नेहा को इस बारे में पता चला तो वह फुट फुट कर रोने लगी और अपनी सहेलियों से माफी माँगने लगी।
तब रेखा और राधा ने उसको गले लगाते हुए कहा कि दोस्ती में माफी नही चलती।
स्वरचित और मौलिक

रूचिका राय

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